भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

२६० * संक्षिप्त नारदपुराण *


आदि धातु मैंने तुम्हें परस्मैपदी कहे हैं। 'दीधीङ्' और 'वेवीङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४३॥ 'षस' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। मुनिश्रेष्ठ! 'चर्करीतं च' यह यङ्लुगन्तका प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। 'हृङ्' धातु अनुदात्तेत् कहा गया है॥ ४४॥ इस प्रकार अदादि गणमें तिहत्तर धातु बताये गये हैं।

'हु' आदि चार धातु (हु, भी, ह्री और पृ) परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४५॥ 'भृञ्' धातु स्वरितेत् और 'ओहाक्' धातु उदात्तेत् है। 'माङ्' और 'ओहाङ्'—ये दोनों धातु अनुदात्तेत् हैं। दानार्थक 'दा' और धारणार्थक 'धा'—इनमें स्वरितकी इत्संज्ञा हुई है॥ ४६॥ 'णिजिर्' आदि तीन धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। 'घृ' आदि बारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४७॥ इस प्रकार ह्वादि (जुहोत्यादि) गणमें बाईस धातु कहे गये हैं।

'दिव्' आदि पचीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं॥ ४८॥ नारद! 'षूङ्' आदि 'दूङ्'—ये आत्मनेपदी हैं। 'षूङ्' आदि सात धातु ओदित् और आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४९॥ विप्रवर! 'लीङ्' आदि धातु यहाँ आत्मनेपदी बताये गये हैं। श्यति (शो) आदि चार धातु परस्मैपदी हैं॥ ५०॥ मुने! 'जनी' आदि पंद्रह धातु आत्मनेपदी हैं। 'मृष' आदि पाँच धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं॥ ५१॥ 'पद' आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं। यहाँ वृद्धि-अर्थमें ही अकर्मक 'राध' धातुका ग्रहण है। यह स्वादि और चुरादिगणमें भी पढ़ा गया है॥ ५२॥ राध आदि तेरह धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् रध आदि आठ धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५३॥ शम आदि छियालीस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। इस प्रकार दिवादिमें एक सौ चालीस धातु माने गये हैं॥ ५४॥

'सु' आदि नौ धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। मुने! 'दु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५५॥ 'अश' और 'ष्टिष' ये दो धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। यहाँ 'तिक' आदि चौदह धातुओंको परस्मैपदी माना गया है॥ ५६॥ विप्रवर! स्वादिगणमें कुल बत्तीस धातु बताये गये हैं।

मुनिश्रेष्ठ! 'तुद' आदि छः स्वरितेत् हैं॥ ५७॥ 'ऋषी' धातु उदात्तेत् है और 'जुषी' आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं। 'व्रश्च' आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ५८॥ मुनीश्वर! यहाँ केवल 'गुरी' धातु अनुदात्तेत् बताया गया है। 'णू' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ५९॥ 'कुङ्' धातुको 'अनुदात्तेत्' कहा गया है। यहीं कुतादिगणकी पूर्ति हुई है। 'पृङ्' और 'मृङ्'—ये आत्मनेपदी धातु हैं। 'रि' और 'पि' से छः धातुतक परस्मैपदमें गिने गये हैं॥ ६०॥ 'दृङ्', 'धृङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी कहे गये हैं। मुने! 'प्रच्छ' आदि सोलह धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ६१॥ मुने! फिर 'मिल' आदि छः धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। इसके बाद 'कृती' आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं॥ ६२॥ इस प्रकार तुदादिमें एक सौ सत्तावन धातु हैं।

'रुध' आदि नौ धातु स्वरितेत् हैं। 'कृती' धातु परस्मैपदी है। 'जिइन्धी'से तीन धातुतक अनुदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् 'शिष पिष' आदि बारह धातु उदात्तेत् हैं। इस प्रकार रुधादि-गणमें कुल पचीस धातु हैं॥ ६३-६४॥

'तनु' धातुसे लेकर सात धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं। 'मनु' और 'वनु'—ये दोनों आत्मनेपदी हैं। 'कृञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है॥ ६५॥ विप्रवर! इस प्रकार वैयाकरणोंने तनादिगणमें दस धातुओंकी गणना की है।

'क्री' आदि सात धातु उभयपदी हैं। मुनीश्वर! 'स्तम्भु' आदि चार सौत्र (सूत्रोक्त) धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'क्रूञ्' आदि बाईस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ६६-६७॥ 'वृङ्' धातु आत्मनेपदी है। 'श्रन्थ' आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी हैं और 'ग्रह' धातु स्वरितेत् है॥ ६८॥ इस प्रकार विद्वानोंने क्र्यादिगणमें बावन धातु गिनाये हैं।

चुर आदि एक सौ छत्तीस धातु जित्