संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 264, कुल 770 में से
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हेतु है (पारायण-जनित पुण्यलाभके लिये ही उनका संकलन होता है)। सिद्ध शब्दोंका ही प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और आगम आदिके द्वारा लघुमार्गसे सम्यक् निरूपण किया जाता है। इस प्रकार तुमसे निरुक्तका यत्किंचित् ही वर्णन किया गया है। नारद! इसका पूर्णरूपसे वर्णन तो कोई भी कर ही नहीं सकता॥ ८६-८८॥
(पूर्वभाग द्वितीयपाद अध्याय ५३)
त्रिस्कन्ध ज्योतिषके वर्णन-प्रसङ्गमें गणितविषयका प्रतिपादन
सनन्दन उवाच
ज्यौतिषाङ्गं प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा।
यस्य विज्ञानमात्रेण धर्मसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥ १ ॥
त्रिस्कन्धं ज्यौतिषं शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम्।
गणितं जातकं विप्र संहितास्कन्धसंज्ञितम् ॥ २ ॥
गणिते परिकर्माणि खगमध्यस्फुटक्रिये।
अनुयोगश्चन्द्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम् ॥ ३ ॥
छाया शृङ्गोन्नतिर्युती पातसाधनमीरितम्।
निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः।
कर्माजीवं चाष्टवर्गो राजयोगाश्च नाभसाः ॥ ५ ॥
चन्द्रयोगाः प्रव्रज्याख्या राशिशीलं च दृक्फलम्।
ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीर्णके ॥ ६ ॥
अनिष्टयोगाः स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च।
नष्टजन्मविधानं च तथा द्रेष्काणलक्षणम् ॥ ७ ॥
श्रीसनन्दनजी कहते हैं—देवर्षे! अब मैं ज्योतिष नामक वेदाङ्गका वर्णन करूँगा, जिसका पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने उपदेश किया है तथा जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्योंके धर्मकी सिद्धि हो सकती है॥ १॥ ब्रह्मन्! ज्योतिषशास्त्र चार लाख श्लोकोंका बताया गया है। उसके तीन^१ स्कन्ध हैं, जिनके नाम ये हैं—गणित (सिद्धान्त), जातक (होरा) और संहिता॥ २॥ गणितमें परिकर्म^२, ग्रहोंके मध्यम एवं स्पष्ट करनेकी रीतियाँ बतायी गयी हैं। इसके सिवा अनुयोग (देश, दिशा और कालका ज्ञान), चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्र-शृङ्गोन्नति^३, ग्रहयुति (ग्रहोंका योग) तथा पात (महापात=सूर्य-चन्द्रमाके क्रान्तिसाम्य)-का साधन-प्रकार कहा गया है॥ ३\frac{१}{२}॥
जातकस्कन्धमें राशिभेद, ग्रहयोनि, (ग्रहोंकी जाति, रूप और गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर-जन्मफल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशील, ग्रहदृष्टिफल, ग्रहोंके भावफल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातक-फल, निर्याण (मृत्युविषयक विचार), नष्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-कालको जाननेका प्रकार) तथा द्रेष्काणों^४के स्वरूप—इन सब विषयोंका वर्णन है॥ ४—७॥
जातके राशिभेदाश्च ग्रहयोनिवियोनिजे ॥ ४ ॥
संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम्।
तिथिवासरनक्षत्रयोगतिथ्यर्द्धसंज्ञकाः ॥ ८ ॥
मुहूर्तोपग्रहाः सूर्यसंक्रान्तिर्गोचरः क्रमात्।
चन्द्रताराबलं चैव सर्वलग्नार्तवाह्वयः ॥ ९ ॥
आधानपुंससीमन्तजातनामान्नभुक्तयः ।
चौल कर्णच्छिदा मौञ्जी क्षुरिकाबन्धनं तथा ॥ १० ॥
१. किसी-किसीके मतसे ज्योतिषके पाँच स्कन्ध हैं—सिद्धान्त, होरा, संहिता, स्वर और सामुद्रिक। सिद्धान्तको ही गणित कहते हैं। होराका ही दूसरा नाम जातक है।
२. योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल—ये परिकर्म कहे गये हैं।
३. द्वितीयाको जो चन्द्रोदय होता है, उसमें कभी चन्द्रमाका दक्षिण सींग और कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपरको उठा रहता है, उसीको 'चन्द्रशृङ्गोन्नति' कहा गया है। ज्योतिषमें उसके परिणामका विचार किया गया है।
४. राशिके तृतीय भाग (१० अंश)-की 'द्रेष्काण' संज्ञा है।