संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २७३
व्यास आकृतिसंक्षुण्णोऽष्ट्यासः स्यात् परिधिर्मुने ॥४६॥* ज्याव्यासयोगविवराहतमूलोनितोऽर्धितः । व्यासः शरः शरोनाच्च व्यासाच्छरगुणात् पदम् ॥४७॥ द्विघ्नं जीवाथ जीवार्धवर्गे शरहते युते । व्यासो वृत्ते भवेदेवं प्रोक्तं गणितकोविदैः ॥४८॥
मुने ! व्यासको २२ से गुण देना और ७ से भाग देना चाहिये, इससे स्थूल परिधिका ज्ञान होता है२ ॥४६॥ ज्या (जीवा) और व्यासका योग एक जगह रखना और अन्तरको दूसरी जगह रखना चाहिये। फिर इन दोनोंका घात (गुणा)
*नारदपुराणके इस गणितविभागमें क्षेत्रव्यवहारकी चर्चामात्र होकर दूसरे विषय आ गये हैं; त्रिभुजादि क्षेत्रफलका विवेचन न होनेसे यह प्रकरण अधूरा-सा लगता है। जान पड़ता है, इस विषयके श्लोक लेखकके प्रमादसे छूट गये हैं; अतः टिप्पणीमें संक्षेपतः उक्त न्यूनताकी पूर्ति की जाती है।
त्रिभुजे भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो हतः । भुवा लब्ध्या युतोना भूर्द्विष्ठा च दलिता पृथक् ॥
आबाधे भुजयोर्ज्ञेये क्रमशश्चाधिकल्पयोः । स्वाबाधाभुजयोर्वर्गान्तरान्मूलं च लम्बकः ॥
लम्बभूमिहतेरर्धं प्रस्फुटं त्रिभुजे फलम् । ततो बहुभुजान्तःस्थत्रिभुजेभ्यश्च तत्फलम् ॥
(त्रिभुजादि क्षेत्रफलानयन) त्रिभुजका फल जानना हो तो उसके तीन भुजोंमें एकको भूमि और शेष दोको भुज मानकर क्रिया करे। यथा—दोनों भुजके योगको उन्हीं दोनोंके अन्तरसे गुणा करके गुणनफलमें भूमिसे भाग देनेपर जो लब्धि हो, उसको भूमिमें जोड़कर आधा करे तो बड़े भुजकी 'आबाधा' होती है और उसी लब्धिको भूमिमें घटाकर आधा करनेसे लघुभुजकी 'आबाधा' होती है। अपने-अपने भुज और आबाधाके 'वर्गान्तर' करके शेषका मूल लेनेसे लम्बका मान प्रकट होता है। लम्ब और भूमिके गुणनफलका आधा त्रिभुजका क्षेत्रफल होता है।
उदाहरण—कल्पना कीजिये कि किसी त्रिभुजमें तीनों भुजोंके मान क्रमसे १३, १४, १५ हैं तो उस त्रिभुजका क्षेत्रफल क्या होगा ? तो यहाँ १४ को भूमि और १३, १५ को भुज मानकर क्रिया होगी। यथा—दोनों भुजके योग २८ को उन्हीं दोनोंके अन्तर २ से गुणा करनेपर ५६ हुआ। इसमें भूमि १४ के द्वारा भाग देनेसे लब्धि ४ हुई। इस चारको भूमि १४ में जोड़कर आधा करनेसे ९ हुआ—यह बड़े भुजकी 'आबाधा' का मान है। एवं भूमिमें लब्धिको घटाकर आधा करनेसे ५ हुआ। यह लघुभुजकी 'आबाधा' हुई। भुज और आबाधाके वर्गान्तर (२२५-८१=१४४) अथवा (१६९-२५=१४४) का मूल १२ हुआ। यह लम्बका मान है। लम्ब और भूमिके गुणनफल (१२×१४)=१६८ का आधा ८४ हुआ, यह उक्त त्रिभुजका क्षेत्रफल है।
इस प्रकार त्रिभुज फलानयनकी रीति जानकर बहुभुजक्षेत्रमें एक कोणसे दूसरे कोणतक कर्णरेखाको भूमि और उसके आश्रित दो भुजोंको भुज मानकर फल निकाला जायगा। चतुर्भुजमें दोनों त्रिभुजोंके फलको जोड़नेसे क्षेत्रफलकी सिद्धि होगी एवं पञ्चभुजमें ३ त्रिभुज बनेंगे और उन तीनों त्रिभुजोंके फलोंका योग करनेसे फल सिद्ध होगा। इसी प्रकार षड्भुज आदिमें भी समझना चाहिये।
विशेष वक्तव्य—तीन रेखाओंसे बना हुआ क्षेत्र त्रिभुज कहलाता है। उन तीनों रेखाओंमें नीचेकी रेखाको भूमि और दोनों बगलकी दो रेखाओंको 'भुज' कहते हैं।
(लम्ब—) ऊपरके कोणसे भूमितक सीधी रेखाको लम्ब कहते हैं।
(आबाधा—) लम्बसे विभक्त भूमिके खण्ड (जो लम्बके दोनों ओर हैं) दोनों भुजोंकी 'आबाधा' कहलाते हैं। निम्नाङ्कित क्षेत्रमें स्पष्ट देखिये—
वृत्तक्षेत्रमें परिधि और व्यासके गुणनफलका चतुर्थांश क्षेत्रफल होता है। जैसे—
जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासमान ७ और परिधि २२ है, उसका क्षेत्रफल जानना है तो परिधि २२ को व्यास ७ से गुणा करनेपर १५४ हुआ। इसका चतुर्थांश ३८ १/२ होता है। यही क्षेत्रफल हुआ।
२. जैसे पूछा गया कि जिस वृत्तक्षेत्रका व्यास १४ है वहाँ परिधिका मान क्या होगा तथा जिसमें ४४ परिधि है, वहाँ व्यासमान क्या होगा ? तो उक्त रीतिके अनुसार व्यास १४ को २२ से गुणा करके गुणनफलमें ७से भाग देनेपर - (२२×१४)/७ = ४४ परिधिमान स्थूल हुआ।