भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 277
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २७५

स्थूलमध्याणवन्नवेधो वृत्ताङ्कांशेशभागिकः ॥५१॥ वृत्तांशांशकृतिर्वेधनिघ्नी घनकरा मितौ । वारिव्यासहतं दैर्घ्यं वेधाङ्गुलहतं पुनः ॥५२॥ खखेन्दुरामविहृतं मानं द्रोणादि वारिणः । विस्तारायामवेधानामङ्गुल्योऽन्योन्यताडिताः ॥५३॥ रसाङ्गाभ्रब्धिभिर्भक्ता धान्ये द्रोणादिका मितिः । उत्सेधव्यासदैर्घ्याणामङ्गुलान्यश्मनो द्विज ॥५४॥ मिथोघ्नानि भजेत् खाक्षैशैर्द्रोणादिमितिर्भवेत् । विस्ताराद्यङ्गुलान्येवं मिथोघ्नान्ययसां भवेत् ॥५५॥ बाणेभमार्गणैर्लब्धं द्रोणाद्यं मानमादिशेत् ।

(अन्नादि राशि-व्यवहार) राशि-व्यवहारमें स्थूल, मध्यम, सूक्ष्म, अन्नराशियोंमें क्रमशः उनकी परिधिका नवमांश, दशमांश और एकादशांश वेध होता है। परिधिके षष्ठांश लेकर उसका वर्ग करना और उसे वेधसे गुण देना चाहिये। उसका नाम 'घनहस्त' होगा¹। जलके व्यास (चौड़ाई) से लंबाईको गुण देना, फिर उसीको गहराईके अंगुल-मानसे गुण देना तथा ३१०० से भाग देना चाहिये। इससे जलका द्रोणात्मक मान ज्ञात होगा² ॥५१-५२½॥ चौड़ाई, गहराई और लंबाईके अंगुलात्मक मानको परस्पर गुण देना और उसमें ४०९६ से भाग देना तो अन्नका द्रोणादि मान होगा³। ऊँचाई, व्यास (चौड़ाई) और लंबाईके अंगुलात्मक मानको परस्पर गुण देना और ११५० से भाग देना चाहिये; वह पत्थरका द्रोणात्मक मान होगा⁴। विस्तार आदिके अंगुलात्मक मानको परस्पर गुणा करना चाहिये और ५८५ से भाग देना चाहिये, तो लब्धि लोहेके द्रोणात्मक मानका सूचक होती है⁵ ॥५३-५५½॥

दीपशङ्कुतलच्छिद्रघ्नः शङ्कुर्भा भवेन्मुने ॥५६॥ नरोनदीपकक्षौण्यभक्तो हाथ भोद्धृते । शङ्कौ नृदीपाधश्छिद्रघ्ने दीपौच्च्यं नरान्विते ॥५७॥


१. उदाहरणके लिये प्रश्न—समतल भूमिमें रखे हुए स्थूल धान्यकी परिधि यदि ६० हाथ है तो उसमें कितने घनहस्त (खारी-प्रमाण) होंगे ? तथा सूक्ष्म धान्य और मध्यम धान्यकी परिधि भी यदि ६० हाथ हों तो उनके अलग-अलग खारी-प्रमाण क्या होंगे ? उत्तर-क्रिया—मूलोक्त नियमके अनुसार परिधि-मानका दशमांश ६ यह मध्यम धान्यका वेध हुआ। परिधिके षष्ठांश १० के वर्गको वेधसे गुणा करनेपर १००×६=६०० घनहस्त-मान हुए। एवं सूक्ष्म धान्यका वेध ६०/११ है। इससे परिधिके षष्ठांशके वर्ग १०० को गुण देनेसे सूक्ष्म धान्यके घनहस्त-मान ६०००/११ = ५४५ ५/११ हुए। तथा स्थूल धान्यका वेध ६०/९ है। इससे परिधिके षष्ठांशके वर्गको गुण देनेपर स्थूल धान्यके घनहस्त-मान ६०००/९ = ६६६ २/३ हुए।

२. उदाहरणार्थ प्रश्न—किसी बावलीकी लंबाई ६२ हाथ, चौड़ाई २० हाथ और गहराई १० हाथ है तो बताओ, उस बावलीमें कितने द्रोण जल है ? उत्तर—यहाँ मूलोक्त नियमके अनुसार इस प्रश्नको यों हल करना चाहिये—पहले हाथके मापको अंगुलके मापमें परिणत करनेके लिये उसे २४ से गुणा करना चाहिये। ६२×२४=१४८८ अंगुल लंबाई है। २०×२४=४८० अंगुल चौड़ाई है। १०×२४=२४० अंगुल गहराई है। इन तीनोंके परस्पर गुणनसे १४८८×४८०×२४०=१७१४१७६०० गुणनफल हुआ। इसमें ३१०० से भाग दिया तो १७१४१७६००/३१०० = ५५२९६ लब्धि हुई। इतने ही द्रोण जल उस बावलीमें है।

३. उदाहरणके लिये प्रश्न—किसी अन्न-राशिकी लंबाई ६४ अंगुल, चौड़ाई ३२ अंगुल और ऊँचाई १६ अंगुल है तो उसका द्रोणात्मक मान क्या है ? अर्थात् वह अन्नराशि कितने द्रोण होगी ? मूलकथित नियमके अनुसार ६४×३२×१६ इनके परस्पर गुणनसे ३२७६८ गुणनफल हुआ। इसमें ४०९६ से भाग देनेपर ३२७६८/४०९६ = ८ लब्धि हुई। उत्तर निकला कि वह अन्नराशि ८ द्रोण है।

४. उदाहरणके लिये प्रश्न—किसी पत्थरके टुकड़ेकी लंबाई २३, चौड़ाई २० और ऊँचाई १० अंगुल है तो वह पत्थर कितने द्रोण वजनका है ? (उत्तर) मूलोक्त नियमके अनुसार लंबाई आदिको परस्पर गुणित किया—२३×२०×१० तो गुणनफल ४६०० हुआ। इसमें ११५० से भाग देनेपर लब्धि ४ हुई। अतः ४ द्रोण उस पत्थरके टुकड़ेका मान होगा।

५. जैसे किसीने पूछा—किसी लोह-खण्डकी लंबाई ११७ अंगुल, चौड़ाई १०० अंगुल और ऊँचाई ५ अंगुल है तो उसका वजन कितने द्रोण होगा ? (उत्तर) लंबाई आदिको परस्पर गुणित किया—११७×१००×५=५८५०० इस गुणनफलमें ५८५ से भाग दिया ५८५००/५८५ = १०० लब्धि हुई। अतः १०० द्रोण उस लोहेका परिमाण है।