संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 282, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें२८० * संक्षिप्त नारदपुराण *
जो लब्धि हो, वह स्पष्ट भूपरिधिकी योजन-संख्या होती है१ ॥८३-८४॥
तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता।
कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत् ॥८५॥
रेखाप्रतीचीसंस्थाने प्रक्षिपेत् स्युः स्वदेशजाः।
राक्षसालयदेवौकःशैलयोर्मध्यसूत्रगाः ॥८६॥
अवन्तिकारोहितकं यथा सन्निहितं सरः।
वारप्रवृत्तिः प्राग्देशे क्षपार्धेऽभ्यधिके भवेत् ॥८७॥
तद्देशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत्।
(ग्रहोंमें देशान्तर-संस्कार)— ग्रहकी कलादि मध्यम गतिको देशान्तर-योजन (रेखादेशसे जितने योजन पूर्व या पश्चिम अपना स्थान हो उस)-से गुणा करके गुणनफलमें 'स्पष्टभूपरिधि-योजन' के द्वारा भाग देनेपर जो लब्धि हो, वह कला आदि है। उस लब्धिको रेखासे पूर्व देशमें पूर्वसाधित ग्रहमें घटानेसे और पश्चिम देशमें जोड़नेसे स्वस्थानीय अर्धरात्रिकालिक ग्रह होता है१॥ ८५ १/२ ॥
(रेखा-देश)— लङ्कासे सुमेरुपर्वतपर्यन्त याम्योत्तर-रेखामें जो-जो देश (स्थान) हैं, वे रेखा-देश कहलाते हैं। जैसे उज्जयिनी, रोहितक, कुरुक्षेत्र आदि॥ ८६ १/२ ॥
(वार-प्रवृत्ति)— भूमध्यरेखासे पूर्वदेशमें रेखा-देशीय मध्यरात्रिसे, देशान्तर घटीतुल्य पीछे और रेखासे पश्चिम देशमें मध्यरात्रिसे देशान्तर घटीतुल्य पूर्व ही वार-प्रवृत्ति (रवि-आदि वारोंका आरम्भ) होती है२॥ ८७ १/२ ॥
इष्टनाडीगुणा भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम्॥८८॥
गते शोध्यं तथा योज्यं गम्ये तात्कालिको ग्रह।
भचक्रलिप्ताशीत्यंशं परमं दक्षिणोत्तरम् ॥८९॥
विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यन्तादनुष्णगुः।
तन्नवांशं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः॥९०॥
बुधशुक्रार्कजाः पातैर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गुणम्।
(इष्टकालमें मध्यम ग्रह जाननेकी विधि)— मध्यरात्रिसे जितनी घड़ी बाद ग्रह बनाना हो, उस संख्यासे ग्रहकी कलादि गतिको गुणा करके गुणनफलमें ६० से भाग देकर लब्धितुल्य कलादि फलको पूर्वसाधित ग्रहमें जोड़नेसे तथा जितनी घड़ी मध्यरात्रिसे पूर्व ग्रह बनाना हो, उतनी संख्यासे गतिको गुणा करके गुणनफलमें ६०से भाग देकर कलादि फलको पूर्वसाधित ग्रहमें
१. यथा—१६०० के वर्गको १० गुना करनेसे २,५६,००००० हुआ। इसका मूल (स्वल्पान्तरसे) ५०५८ हुआ। इतना ही योजन स्थूलमानसे मध्यभूपरिधिका प्रमाण है।
गोरखपुरमें स्पष्ट भूपरिधि-साधन—यदि लम्बांश ६३।१५ है, तो उसकी ज्या आगे ९३, ९७ श्लोकोंमें वर्णित रीतिके अनुसार ३०७० हुई। मध्यभूपरिधि ५०५८ को गोरखपुरकी लम्बज्या ३०७० से गुणा कर गुणनफल १५५२८०६० में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेसे लब्धि ४५१६ स्पष्ट भूपरिधि हुई।
देशान्तर-कालज्ञान इस प्रकार होता है—गणितद्वारा सिद्ध चन्द्रग्रहण-स्पर्शकालसे जितने घड़ी-पलके पश्चात् स्पर्श होता है, उतनी ही घड़ीको रेखादेशसे 'पूर्व देशान्तर' तथा जितनी घड़ी पहले ग्रहणका स्पर्श होता है, उतनी घड़ीको 'पश्चिम देशान्तर' समझा जाता है। गोरखपुरमें इस प्रकारसे १ घड़ी और १३ पल पूर्वदेशान्तर है।
इस देशान्तर-पलसे देशान्तर-योजनका ज्ञान त्रैराशिकसे होता है—जैसे ३६०० पलमें स्पष्ट भूपरिधियोजन ४५१६ है तो देशान्तर-पलमें कितना होगा ? इस प्रकार गोरखपुरमें देशान्तर ७३ पलद्वारा रेखादेशसे देशान्तर-योजन (४५१६×७३)/३६०० = ९१ हुआ। इसके द्वारा ग्रहोंमें देशान्तरसंस्कार होता है।
रेखादेशसे गोरखपुरके पूर्व देशान्तर-योजन ९१ को सूर्यकी मध्यगतिकला ५९।८ से गुणा कर गुणनफल ५३८१।८ में स्पष्ट भूपरिधि-योजन ४५१६ से भाग देनेपर लब्ध कलादि १।११ हुई। इसको अहर्गणसाधित मध्यम सूर्य ७।६।५।१८ में पूर्व देशान्तर होनेके कारण घटानेसे ७।६।४।७ यह मध्यरात्रिकालिक मध्यम सूर्य हुआ।
१. पात (राहु) में देशान्तरसंस्कार विपरीत होता है।
२. रेखा-देशके मध्यरात्रि-समयसे ही सृष्टिका आरम्भ माना गया है; इसलिये रेखा-देशके मध्यरात्रि-समयमें ही वारप्रवेश होता है।