संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 770 में से
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- संक्षिप्त नारदपुराण *
दक्षिण तथा उत्तर दिशाके बिन्दु समझे। फिर इस दक्षिणोत्तर-रेखापर पूर्व-युक्तिसे मत्स्योत्पादनद्वारा पूर्वापर-रेखा बनावे तो यह रेखा केन्द्रबिन्दुमें होकर ठीक पूर्व और पश्चिम-बिन्दु का वृत्तमें स्पर्श करेगी। इस प्रकार चार दिशाओंको जानकर पुनः दो-दो दिशाओंके मध्यबिन्दुसे मत्स्योत्पादनद्वारा विदिशाओं (कोणों)-का ज्ञान करना चाहिये॥ १२५-१२८॥
(इस प्रकार वृत्तमें दिशाओंका ज्ञान होनेपर) वृत्तके बाहर चारों दिशाओंके बिन्दुओंसे स्पर्शरेखाद्वारा चतुरस्र (चतुर्भुज) बनावे। वृत्तके मध्यकेन्द्रसे भुजाङ्गुलतुल्य (भुजकी दिशामें उत्तर या दक्षिण) बिन्दुपर छायारेखा होती है। उस छायारेखाको पूर्वापर-रेखाके समानान्तर बनावे। पूर्वापर-रेखा, पूर्वापर-वृत्त, उन्मण्डल और नाडी वृत्तके धरातलमें होती है। इसलिये क्षितिज धरातलगत वृत्तके केन्द्रसे पूर्वापर रेखा खींचकर फिर पलभाग्र बिन्दुगत पूर्वापरके समानान्तर रेखा बनावे। इस प्रकार इष्ट-छायाग्रगत तथा पलभा रेखाके बीच (अन्तर)-को 'अग्रा' कहते हैं॥ १२९-१३१॥
शङ्कुच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णोऽस्य वर्गः । प्रोज्झ्य शङ्कुकृतिं मूलं छाया शङ्कुर्विपर्ययात् ॥ १३२॥
शङ्कु (१२)-के वर्गमें छायाके वर्गको जोड़कर मूल लेनेसे छायाकर्ण होता है और छायाकर्णके वर्गमें शङ्कके वर्गको घटानेसे मूल छाया होती है तथा छायाके-घटानेसे मूल शङ्कु होता है¹ ॥ १३२॥
त्रिंशत्कृत्वो युगे भानां चक्रं प्राक् प्रलम्बते । तद्गुणाद्द्द्युदिनैर्भक्ताद् द्युगणाद्यदवाप्यते ॥ १३३॥ तद्दोस्त्रिघ्नाद्दशांशांशा विज्ञेया अयनाभिधाः । तत्संस्कृताद्ग्रहात्क्रान्तिच्छायाचरदलादिकम् ॥ १३४॥
(अयनांश-साधन—) एक युगमें राशिचक्र सृष्ट्यादि स्थानसे पूर्व और पश्चिमको ६०० बार चलित होता है। जो उसके भगण कहलाते हैं। इसलिये अहर्गणको ६०० से गुणा करके युगके कुदिनसे भाग देकर राश्यादि-फलसे भुज बनावे। उस भुजको ३ से गुणा करके १० के द्वारा भाग दे तो लब्धि अयनांश होती है। इस अयनांशको अहर्गणद्वारा साधित ग्रहमें जोड़कर क्रान्ति, छाया और चरखण्ड आदि बनाने चाहिये² ॥१३३-१३४॥
शंकुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते । लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा ॥ १३५॥ स्वाक्षाकार्कप्रक्रमयुतिर्दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा । शेषा नतांशाः सूर्यस्य तद्बाहुज्या च कोटिजा ॥ १३६॥ शंकमानाङ्गुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् । कोटिज्यया विभज्याप्ते छायाकर्णावहर्दले ॥ १३७॥
(लम्बांश और अक्षांश-साधन—) शंकु (१२) और पलभाको पृथक्-पृथक् त्रिज्यासे गुणा करके उसमें पलकर्णसे भाग देनेपर लब्धि क्रमशः 'लम्बज्या' और 'अक्षज्या' होती है। दोनोंके चाप बनानेसे 'लम्बांश' और 'अक्षांश' होते हैं। इनकी दिशा सर्वदा दक्षिण समझी जाती है³ ॥ १३५॥
(सूर्य-ज्ञानसे मध्याह्न-छाया-साधन—) अपने अक्षांश और सूर्यके क्रान्त्यंश दोनों एक दिशाकी ओर हों तो योग करनेसे और यदि भिन्न दिशाके हों तो दोनोंको अन्तर करनेसे शेष सूर्यका 'नतांश' होता है। उस 'नतांश' की 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनावे। भुजज्या और त्रिज्याको पृथक्-पृथक् शङ्कुमान (१२) से गुणा करके उसमें कोटिज्यासे भाग देनेपर लब्धि क्रमशः मध्याह्नकालमें छाया और छायाकर्णके मानका
१. क्योंकि शंकुकोटि, छायाभुज और इन्हीं दोनोंके वर्गयोगका मूल छायाकर्ण कहलाता है। २. अयनांश-साधनका उदाहरण काल-साधनमें पहले बतलाया जा चुका है। ३. जैसे—१२ अङ्गुल शंकुको त्रिज्याका ३४३८ से गुणा कर गुणनफल ४१२५६ में पलकर्ण १३+ २/५ = ६७/५ से भाग देनेपर लब्धि ३०७९ लम्बज्या हुई, इसकी चापकला ३८१४ में ६० से भाग देनेपर अंशादि ६३। ३४ लम्बांश हुआ। इसको ९० अंशमें घटानेसे २६। २६ अक्षांश हुआ।