भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 298

२९६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


तल्लम्बपातबिम्बान्तर्दृगौच्यामरविघ्नभा ॥ १६४॥
(ग्रहोंके उदयास्तकालांश—) १२, १७, १३, ११, ९, १५ ये क्रमसे चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र और शनिके कालांश हैं। अपने-अपने कालांशतुल्य सूर्यसे पीछे ग्रह होते हैं तो अस्त और कालांशतुल्य सूर्यसे आगे होते हैं तो उदय होता है। (अर्थात् ग्रह अपने-अपने कालांशके भीतर सूर्यसे पीछे या आगे जबतक रहते हैं, तबतक सूर्य सान्निध्यवश अस्त (अदृश्य) रहते हैं) ॥ १६३॥
(ग्रहोंके प्रतिबिम्बद्वारा छायासाधन—) सम भूमिमें रखे हुए दर्पण आदिमें ग्रहोंके प्रतिबिम्बको


इसमें २।२३ कलादिको घटानेपर ५।२३।४२।४४ पृष्ठस्थानीय दृग्वर्क हुआ। इसको ६ राशिमें घटानेपर शेष ०।६।१७।१६ यही भुजांश हुआ। इसको पूर्वोक्त शर-साधन-विधिके अनुसार ११ से गुणा करके ७ का भाग देनेपर लब्ध अङ्गुलादि ९।५२ शर हुआ। यह दृग्युके उत्तर गोलमें (६ राशिसे कम) होनेके कारण उत्तर दिशाका हुआ।

फिर लम्बन ०।११ को ६ से गुणा करनेपर गुणनफल अंशादि १।६ को (ऋणलम्बन होनेके कारण) वित्रिभ लग्न ८।२।४६।१७ में घटानेपर ८।१।४०।१७ हुआ। इससे क्रान्ति-साधन-विधिके अनुसार दक्षिण दिशाकी क्रान्ति २३।३४।३५। हुई। इसको दक्षिण दिशाके अक्षांश २५।२६।४२ में जोड़नेसे ४९।१।१७ दक्षिण दिशाका पृष्ठस्थानीय (स्पष्ट) नतांश हुआ। इस नतांशमें १० का भाग देनेपर लब्ध कलादि ४।५४ को १८ घटानेसे शेष १३।६ रहा। इसको उक्त दशमांश ४।५४ से ही गुणा करनेपर ६४।११ कलादि हुआ; इसके अंश १।४।११ को ६ अंश १८ कलामें घटानेपर ५।१३।४९ हुआ। इससे उपर्युक्त गुणनफल ६४।११ में भाग देनेपर लब्धि १२।१८ अङ्गुलादि नति हुई। दक्षिण नतांश होनेके कारण इसकी दिशा दक्षिण हुई और पूर्वसाधित अङ्गुलादि शर ९।५२ यह उत्तर दिशाका है; अतः भिन्न दिशा होनेके कारण दोनोंका अन्तर २।२६ अङ्गुलादि स्पष्ट शर हुआ। इस स्पष्ट शरके द्वारा चन्द्रग्रहणकी भाँति ग्रासमान आदि साधन करनेके लिये सूर्यस्पष्ट गति ६१।१५ को २ से गुणा कर गुणनफलमें ११ का भाग देनेपर सूर्यविम्ब ११।८ हुआ और चन्द्रस्पष्ट गति ७२६।३० में ७४ का भाग देनेपर चन्द्रबिम्ब ९।४९ हुआ। इन दोनोंका योगका आधा किया तो १०।२८ हुआ, उसमें स्पष्ट शर २।२६ को घटानेपर शेष अङ्गुलादि ८।२ यह ग्रासमान हुआ।

अब स्थिति-घटी-साधन करनेके लिये सूर्य और चन्द्रके विम्बयोगार्ध १०।२८ में स्पष्ट शर २।२६ को जोड़नेपर योगफल १२।५४ हुआ। इसको १० से गुणा करनेपर गुणनफल १२९।० को ग्रासमान ८।२ से गुणा किया तो गुणनफल १०३६।१८ हुआ। इसके मूल ३२।११ में इसीके षष्ठांश ५।२२ को घटानेपर शेष २६।४९ में चन्द्रविम्ब ९।४९ का भाग देनेपर लब्धि घट्यादि २।४४ स्थिति-घटी हुई।

अब स्थिति-घटी २।४४ को ६ से गुणा करके गुणनफल अंशादि १६।२४ को वित्रिभ लग्न ८।२।४६।१७ में घटानेसे ७।१६।२२।१७ स्पर्शकालिक वित्रिभ हुआ। तथा दर्शान्तकालकी गति ६१।१५ को स्थिति-घटी २।४४ द्वारा गुणा करके गुणनफल १६७ में ६० का भाग देनेपर लब्धि २।४७ को दर्शान्तकालिक सूर्य ८।५।२६।२५ में घटानेपर स्पर्शकालिक सूर्य ८।५।२३।३८ हुआ। इन स्पर्शकालिक सूर्य और वित्रिभ लग्नके द्वारा पूर्वदर्शित विधिसे स्पर्शकालिक ऋणलम्बन १।१७ घट्यादि हुआ।

इसी प्रकार स्थिति-घटी २।४४ को ६ से गुणा करनेपर अंशादि फल १६।२४ को वित्रिभ लग्न ८।२।४६।१७ में जोड़नेसे मोक्षकालिक वित्रिभ लग्न ८।१९।१०।१७ हुआ। एवं सूर्यगति ६१।१५ को स्थिति-घटी २।४४ से गुणा कर गुणनफल १६७ में ६० का भाग देनेपर भागफल २।४७ को सूर्य ८।५।२६।२५ में जोड़नेसे मोक्षकालिक स्पष्ट सूर्य ८।५।२९।२२ हुआ। इन दोनों (वित्रिभ और सूर्य) के द्वारा पूर्वकथित विधिसे मोक्षकालिक धनलम्बन (सूर्यसे वित्रिभ अधिक होनेके कारण) घट्यादि ०।५६ हुआ।

अब दर्शान्तकाल १३।४ में स्थिति-घटी २।४४ को घटानेसे १०।२० मध्यमस्पर्शकाल हुआ, इसमें स्पर्शकालिक ऋणलम्बन १।१७ को घटानेसे ९।३ स्पष्ट (भूपृष्ठस्थानीय) स्पर्शकाल हुआ तथा दर्शान्तकालमें स्थिति-घटी जोड़नेपर मध्यम दर्शान्तकाल १५।४८ हुआ। एवं इसमें मोक्षकालिक धनलम्बन ०।५६ जोड़नेपर १६।४४ स्पष्ट मोक्षकाल हुआ।