संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
कामातुर, मलिन, बाल्यावस्थामें रोगी और आलसी होता है। किंतु यदि अपनी राशि (मकर-कुम्भ) या अपने उच्च (तुला)में हो तो जातक भूपति, ग्रामपति, पण्डित और सुन्दर शरीरवाला होता है। अन्य (द्वितीय आदि) भावोंमें सूर्यके समान ही शनिके भी फल होते हैं॥ २५७-२५८॥
(फलमें न्यूनाधिकत्व—) शुभग्रह यदि अपने उच्चमें हों तो पूर्णरूपसे उपर्युक्त फल प्राप्त होता है। यदि अपने मूल त्रिकोणमें हो तो तीन चरण, अपनी राशिमें हो तो आधा, मित्रके गृहमें हो तो एक चरण तथा शत्रु की राशिमें हो तो उससे भी कम फल प्राप्त होता है और नीचमें या अस्त हो तो कुछ भी फल नहीं होता है। (इस प्रकार शुभ ग्रहके फल कहनेसे सिद्ध होता है कि पापग्रहका फल इसके विपरीत होता है। अर्थात् पापग्रह नीचमें या अस्त हो तो पूर्ण फल, शत्रु-राशिमें तीन चरण, मित्र-राशिमें आधा, अपनी राशिमें एक चरण, अपने मूल त्रिकोणमें उससे भी अल्प और अपने उच्चमें हो तो अपना कुछ भी फल नहीं देता है)॥ २५९ १/२ ॥
(स्वराशिस्थ ग्रहफल—) यदि अपनी राशिमें एक ग्रह हो तो जातक अपने पिताके सदृश धनवान् और यशस्वी होता है। दो ग्रह अपनी राशिमें हों तो बालक अपने कुलमें श्रेष्ठ, तीन ग्रह हों तो बन्धुओंमें माननीय, चार ग्रह हों तो विशेष धनवान्, पाँच ग्रह हों तो सुखी, छः ग्रह हों तो भोगी और यदि सातों ग्रह अपनी राशिमें स्थित हों तो जातक राजा होता है॥ २६० १/२ ॥
यदि अपने मित्रकी राशिमें एक ग्रह हो तो जातक दूसरेके धनसे पालित, दो ग्रह हों तो मित्रोंके द्वारा पोषित और तीन ग्रह हों तो वह अपने बन्धुओंके द्वारा पालित होता है। यदि चार ग्रह मित्रराशिमें हों तो बालक अपने बाहुबलसे जीवननिर्वाह करता है। पाँच ग्रह हों तो बहुत लोगोंका पालन करनेवाला होता है। छः ग्रह हों तो सेनापति और सातों ग्रह मित्रराशिमें हों तो जातक राजा होता है॥ २६१ १/२ ॥
पापग्रह यदि विषम राशि और सूर्यकी होरा (राश्यर्ध)-में हों तो जातक लोकमें विख्यात, महान् उद्योगी, अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान्, धनवान् और बलवान् होता है। तथा शुभग्रह यदि समराशि और चन्द्रमाकी होरामें हों तो जातक कान्तिमान्, मृदु (कोमल) शरीरवाला, भाग्यवान्, भोगी और बुद्धिमान् होता है। यदि पापग्रह समराशि और सूर्यकी होरामें हों तो पूर्वोक्त फल मध्यम (आधा) होता है। एवं शुभ यदि विषमराशि और सूर्यकी होरामें हों तो ऊपर कहे हुए फल नहीं प्राप्त होते हैं॥ २६२-२६४॥
चन्द्रमा यदि अपने या अपने मित्रके द्रेष्काणमें हो तो जातक सुन्दर स्वरूपवाला और गुणवान् होता है। अन्य द्रेष्काणमें हो तो उस द्रेष्काणकी राशि और द्रेष्काणपतिके सदृश ही फल प्राप्त होता है। (सारांश यह है कि उस द्रेष्काणका स्वामी यदि चन्द्रमाका मित्र हो तो तीन चरण फल मिलता है, सम हो तो दो चरण (आधा) फल मिलता है तथा शत्रु हो तो एक चरण फल होता है।) यदि सर्प द्रेष्काण*, शस्त्र द्रेष्काण, चतुष्पद द्रेष्काण और पक्षी द्रेष्काणमें चन्द्रमा हो तो जातक क्रमशः उग्र-स्वभाव, हिंसाके स्वभाववाला, गुरुकी शय्यापर बैठनेवाला और भ्रमणशील होता है॥ २६५-२६६ १/२ ॥
(लग्ननवमांश राशिफल—) लग्नमें मेषका नवमांश हो तो जातक चोरस्वभाव, वृष-नवमांश हो तो भोगी, मिथुन-नवमांश हो तो धनी, कर्क- नवमांश हो तो बुद्धिमान्, सिंह-नवमांश हो तो राजा, कन्या-नवमांश हो तो नपुंसक, तुला- नवमांश हो तो शत्रुको जीतनेवाला, वृश्चिक- नवमांश हो तो बेगारी करनेवाला, धनुका नवमांश
* द्रेष्काणनिरूपणमें देखिये।