संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 770 में से
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कर्म शुभ या अशुभ कहा गया है, वह उसके क्षणवारमें भी उसी प्रकार शुभ-अशुभ समझना चाहिये॥ १६७ १/२ ॥
(नक्षत्राधिपति-कथन—) १ दस्र (अश्विनीकुमार), २ यम, ३ अग्नि, ४ ब्रह्मा, ५ चन्द्र, ६ शिव, ७ अदिति, ८ गुरु, ९ सर्प, १० पितर, ११ भग, १२ अर्यमा, १३ सूर्य, १४ विश्वकर्मा, १५ वायु, १६ इन्द्र और अग्नि, १७ मित्र, १८ इन्द्र, १९ राक्षस (निर्ऋति), २० जल, २१ विश्वेदेव, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ वसु, २५ वरुण, २६ अजैकपाद, २७ अहिर्बुध्न्य और २८ पूषा—ये क्रमशः (अभिजित्सहित) अश्विनी आदि २८ नक्षत्रोंके स्वामी कहे गये हैं॥ १६८-१७०॥
(नक्षत्रोंके मुख—) पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाद्रपद, मघा, आश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा, भरणी, मूल—ये नौ नक्षत्र अधोमुख (नीचे मुखवाले) हैं। इनमें बिलप्रवेश (कुआँ, भूविवर या पाताल आदिमें जाना), गणित, भूतसाधन, लेखन, शिल्प (चित्र आदि) कला, कुआँ खोदना तथा गाड़े हुए धनको निकालना आदि सब कार्य सिद्ध होते हैं॥ १७१-१७२॥
अनुराधा, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, रेवती, अश्विनी और स्वाती—ये नौ नक्षत्र तिर्यक् (सामने) मुखवाले हैं। इनमें हल जोतना, यात्रा करना, गाड़ी बनाना, पत्र लिखकर भेजना, हाथी, ऊँट आदिकी सवारी करना, गदहे, बैल आदिसे चलनेवाले रथ बनाना, नौकापर चलना तथा भैंस, घोड़े आदि-सम्बन्धी कार्य करने चाहिये ॥ १७३-१७४ ॥
रोहिणी, श्रवण, आर्द्रा, पुष्य, शतभिषा, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ तथा उत्तर भाद्रपद—ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुख (ऊपर मुखवाले) कहे गये हैं। इनमें राज्याभिषेक, मङ्गल (विवाहादि)-कार्य, गजारोहण, ध्वजारोपण, मन्दिर-निर्माण, तोरण (फाटक) बनाना, बगीचे लगाना और चहारदीवारी बनवाना आदि कार्य सिद्ध होते हैं॥ १७५-१७६॥
| १० | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ११ | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि |
| १२ | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र |
| १३ | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध |
| १४ | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम |
| १५ | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
| १६ | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु |
| १७ | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल |
| १८ | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि |
| १९ | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र |
| २० | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध |
| २१ | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम |
| २२ | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
| २३ | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु |
| २४ | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल |
क्षणवार (होरेश) जाननेका प्रकार यह है कि जिस दिन होरेश (क्षणवार)-का विचार करना हो, उस दिनका प्रथम घंटा उसी दिनका क्षणवार होता है। इससे आगे उससे छठे-छठे दिनका क्षणवार समझे। जैसे रविवारमें वारप्रवेश-कालसे पहला घंटा रविका, दूसरा घंटा रविसे छठे शुक्रका, तीसरा घंटा शुक्रसे छठे बुधका इत्यादि क्रमसे ऊपर चक्रमें देखिये।