संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३५७
किसी संक्रान्तिके बाद सूर्य जितने अंश भोगकर उस संक्रान्तिके आगे अयनसंक्रान्ति करे, उतने समयतक संक्रान्ति या ग्रहणका जो नक्षत्र हो, वह तथा उसके आगे-पीछेवाले दोनों नक्षत्र उपनयन और विवाहादि शुभ कार्योंमें अशुभ होते हैं। संक्रान्ति या ग्रहणजनित अनिष्ट फलों (दोषों)-की शान्तिके लिये तिलोंकी ढेरीपर तीन त्रिशूलवाला त्रिकोण-चक्र लिखे और उसपर यथाशक्ति सुवर्ण रखकर ब्राह्मणोंको दान दे॥ २६७-२६९॥
(ग्रह-गोचर—) ताराके बलसे चन्द्रमा बली होता है और चन्द्रमाके बली होनेपर सूर्य बली हो जाता है तथा संक्रमणकारी सूर्यके बली होनेसे अन्य सब ग्रह भी बली समझे जाते हैं¹॥ २७०॥
मुनीश्वर! अपनी जन्मराशियोंसे ३, ११, १०, ६ स्थानमें सूर्य शुभ होता है; परंतु यदि क्रमशः जन्मराशिसे ही ९, ५, ४ तथा १२ वें स्थानमें स्थित शनिके अतिरिक्त अन्य ग्रहोंसे वह विद्ध न हो तभी शुभ होता है²। इसी प्रकार चन्द्रमा जन्मराशिसे ७, ६, ११, १, १० तथा ३ में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः २, १२, ८, ५, ४ और ९ वेंमें स्थित बुधसे भिन्न ग्रहोंसे विद्ध न हों। मङ्गल जन्मराशिसे ३, ११, ६ में शुभ हैं; यदि क्रमशः १२, ५ तथा ९ वें स्थानमें स्थित अन्य ग्रहसे विद्ध न हों। शनि भी अपनी जन्मराशिसे इन्हीं ३, ११, ६ स्थानोंमें शुभ हैं; यदि क्रमशः १२, ५, ९ स्थानोंमें स्थित सूर्यके सिवा अन्य ग्रहोंसे विद्ध न हों। बुध अपनी जन्मराशिसे २, ४, ६, ८, १० और ११ स्थानोंमें शुभ हों; यदि क्रमशः ५, ३, ९, १, ८ और १२ स्थानोंमें स्थित चन्द्रमाके सिवा अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों। मुनीश्वर! गुरु जन्मराशिसे २, ११, ९, ५ और ७ इन स्थानोंमें शुभ होते हैं; यदि क्रमशः १२, ८, १०, ४ और ३ स्थानोंमें स्थित अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों। इसी प्रकार शुक्र भी जन्मराशिसे १, २, ३, ४, ५, ८, ९, १२ तथा ११ स्थानोंमें शुभ होते हैं; यदि क्रमशः ८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ६, ३ स्थानोंमें स्थित अन्य ग्रहसे विद्ध न हो³॥ २७१-२७६॥
जो ग्रह गोचरमें वेधयुक्त हो जाता है, वह शुभ या अशुभ फलको नहीं देता; इसलिये वेधका विचार करके ही शुभ या अशुभ फल समझना चाहिये॥ २७७॥ वामवेध होने (वेध-स्थानमें ग्रह और शुभ स्थानमें अन्य ग्रहके होने)-से दुष्ट (अशुभ) ग्रह भी शुभकारक हो जाता है। यदि दुष्ट ग्रह भी शुभग्रहसे दृष्ट हो तो शुभकारक हो जाता है तथा शुभप्रद ग्रह भी पापग्रहसे दृष्ट हो तो अनिष्ट फल देता है। शुभ और पाप दोनों ग्रह यदि अपने शत्रुसे देखे जाते हों अथवा नीच राशिमें या अपने शत्रुको राशिमें हों तो निष्फल हो जाते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह अस्त हो वह भी अपने शुभ या अशुभ फलको नहीं देता है। ग्रह
१. भाव यह है कि तारा और ग्रहके बलको देखकर किसी कार्यको आरम्भ करनेका आदेश है। यदि अपनी तारा बलवती हो तो निर्बल चन्द्रमा भी बली माना जाता है तथा रविशुद्धि-विचारसे यदि अपने चन्द्रमा बली हों तो निर्बल सूर्य भी बली हो जाते हैं एवं सूर्यके बली होनेपर अन्य ग्रह अनिष्ट भी हो तो इष्टसाधक हो जाते हैं। इसलिये इन्हीं तीनों (तारा, चन्द्रमा तथा रवि) के बल देखे जाते हैं।
२. सब ग्रहोंके जितने शुभ स्थान कहे गये हैं, क्रमशः उतने ही उनके वेध-स्थान भी कहे गये हैं। जैसे सूर्य तीसरेमें शुभ होता है; किंतु यदि नवेंमें कोई ग्रह हो तो विद्ध हो जाता है; इसी प्रकार अन्य शुभ-स्थान और वेध-स्थान समझने चाहिये।
३. भाव यह है कि ऊपर जो ग्रहोंके शुभ और वेध-स्थान कहे गये हैं, उनमें मनुष्योंको अपनी-अपनी जन्मराशिसे शुभ स्थानोंमें ग्रहोंके जानेसे शुभ फल और वेध-स्थानमें जानेसे अशुभ फल प्राप्त होते हैं। विशेषता यह है कि शुभ स्थानमें जानेपर भी यदि उन ग्रहोंके वेध-स्थानोंमें कोई अन्य ग्रह हो तो वे शुभ नहीं होते हैं, तथा शुभ और वेध-स्थानोंसे भिन्न स्थानमें रहनेपर ग्रह मध्यम फल देनेवाले होते हैं। इसी बातको संक्षेपमें आगे कहते हैं।