भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 770 में से

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३६० * संक्षिप्त नारदपुराण *

चाहिये; क्योंकि अधिक दोषोंसे युक्त कालको ब्रह्माजी भी शुद्ध नहीं कर सकते; इसलिये थोड़े दोषसे युक्त होनेपर भी अधिक गुणवाला लग्न-काल हितकर होता है॥ ३०९—३११½॥

(स्त्रियोंके प्रथम रजोदर्शन—) अमावास्या, रिक्ता (४, ९, १४), ८, ६, १२ और प्रतिपदा—इन तिथियोंमें परिघ योगके पूर्वार्धमें, व्यतीपात और वैधृतिमें, संध्याके समय, सूर्य और चन्द्रके ग्रहणकालमें तथा विष्टि (भद्रा)-में स्त्रीका प्रथम मासिकधर्म अशुभ होता है। रवि आदि वारोंमें प्रथम रजोदर्शन हो तो वह स्त्री क्रमशः रोगयुक्ता, पतिकी प्रिया, दुःखयुक्ता, पुत्रवती, भोगवती, पतिव्रता एवं क्लेशयुक्त होती है॥ ३१२—३१४॥ भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, आश्लेषा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपद—ये नक्षत्र तथा चैत्र, कार्तिक, आषाढ़ और पौष—ये मास प्रथम मासिकधर्ममें अनिष्टकारक कहे गये हैं। भद्रा, सूर्यकी संक्रान्ति, निद्रा-अवस्था—रात्रिकाल, सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण—ये सब प्रथम मासिकधर्ममें शुभ नहीं हैं। अशुभ योग, निन्द्य नक्षत्र तथा निन्दित दिनमें प्रथम मासिकधर्म हो तो वह स्त्री कुलटा स्वभाववाली होती है॥ ३१५-३१६॥ इसलिये इन सब दोषोंकी शान्तिके लिये विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह तिल, घृत और दूर्वासे गायत्री-मन्त्रद्वारा १०८ बार आहुति करे तथा सुवर्णदान, गोदान एवं तिलदान करे॥ ३१७॥

(गर्भाधान-संस्कार—) मासिकधर्मके आरम्भ-से चार रात्रियाँ गर्भाधानमें त्याज्य हैं। सम रात्रियोंमें जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम नवमांशमें हो, लग्नपर पुरुषग्रह (रवि, मङ्गल तथा बृहस्पति)-की दृष्टि हो तो पुत्रार्थी पुरुष सम (२, ४, ६, ८, १०, १२) तिथियोंमें, रेवती, मूल, आश्लेषा और मघा—इन नक्षत्रोंको छोड़कर अन्य नक्षत्रोंमें उपवीती और अनग्न (सवस्त्र) होकर स्त्रीका सङ्ग करे॥ ३१८-३१९॥

(पुंसवन और सीमन्तोन्नयन—) प्रथम गर्भ स्थिर हो जानेपर तृतीय या द्वितीय मासमें पुंसवन कर्म करे। उसी प्रकार ४, ६ या ८ वें मासमें उस मासके स्वामी जब बली हों तथा स्त्री-पुरुष दोनोंको चन्द्रमा और ताराका बल प्राप्त हो तो सीमन्त-कर्म करना चाहिये। रिक्ता तिथि और पर्वको छोड़कर अन्य तिथियोंमें ही उसको करनेकी विधि है। मङ्गल, बृहस्पति तथा रविवारमें, तीक्ष्ण और मिश्रसंज्ञक नक्षत्रोंको छोड़कर अन्य नक्षत्रोंमें जब चन्द्रमा विषमराशि और विषमराशिके नवमांशमें हो, लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो, स्त्री-पुरुषके जन्म-लग्नसे अष्टम राशिलग्न न हो तथा लग्नमें शुभग्रहका योग और दृष्टि हो, पापग्रहकी दृष्टि न हो एवं शुभग्रह लग्नसे ५, १, ४, ७, ९, १० में और पापग्रह ६, ११ तथा ३ में हों एवं चन्द्रमा १२, ८ तथा लग्नसे अन्य स्थानोंमें हो तो उक्त दोनों कर्म (पुंसवन और सीमन्तोन्नयन) करने चाहिये॥ ३२०—३२४॥ यदि एक भी बलवान् पापग्रह लग्नसे १२, ५ और ८ भावमें हो तो वह सीमन्तिनी स्त्री अथवा उसके गर्भका नाश कर देता है॥ ३२५॥

(जातकर्म और नामकर्म—) जन्मके समयमें ही जातकर्म कर लेना चाहिये। किसी प्रतिबन्धकवश उस समय न कर सके तो सूतक बीतनेपर भी उक्त लग्नमें पितरोंका पूजन (नान्दीमुख कर्म) करके बालकका जातकर्म-संस्कार अवश्य करना चाहिये एवं सूतक बीतनेपर अपने-अपने कुलकी रीतिके अनुसार बालकका नामकरण-संस्कार भी करना चाहिये। भलीभाँति सोच-विचारकर देवता आदिका वाचक, मङ्गलदायक एवं उत्तम नाम रखना चाहिये। यदि देश-कालादि-जन्य किसी प्रतिबन्धसे समयपर कर्म न हो सके तो समयके बाद जब गुरु और शुक्रका उदय हो, तब उत्तरायणमें चर, स्थिर, मृदु और क्षिप्र संज्ञक नक्षत्रोंमें शुभग्रहके वार (सोम, बुध, गुरु और शुक्र)-में पिता और

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