संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७२ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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लेकर रेवतीतक (अभिजित्सहित) अट्ठाईस नक्षत्रोंकी योनियाँ हैं॥ ५०५-५०६॥ इनमें श्वान और मृगमें, नकुल और सर्पमें, मेष और वानरमें, सिंह और गजमें, गौ और व्याघ्रमें, मूषक और मार्जारमें तथा महिष और अश्वमें परस्पर भारी शत्रुता होती है॥ ५०७॥
(वर्णकूट—) मीन, वृश्चिक और कर्कराशि ब्राह्मण वर्ण हैं, इनके बादवाले क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण हैं। (एक वर्णके वर और वधूमें तो विवाह स्वयंसिद्ध है ही) पुरुष-राशिके वर्णसे स्त्री-राशिका वर्ण हीन हो तो भी विवाह शुभ माना गया है। इससे विपरीत (अर्थात् पुरुषराशिके वर्णसे स्त्रीराशिका वर्ण श्रेष्ठ) हो तो अशुभ समझना चाहिये॥ ५०८॥
(नाडीविचार—) चार चरणवाले नक्षत्र (अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, श्रवण, शतभिषा, उत्तर भाद्रपद, रेवती— इन)-में उत्पन्न कन्याके लिये अश्विनीसे आरम्भ करके रेवतीतक तीन पर्वोंपर क्रम-उत्क्रम² से गिनकर नाड़ी समझे। तीन चरणवाले (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ और पूर्व भाद्रपद) नक्षत्रोंमें उत्पन्न कन्याके लिये कृत्तिकासे लेकर भरणीतक क्रम-उत्क्रम³ से चार पर्वोंपर गिनकर नाड़ीका ज्ञान प्राप्त करे तथा दो चरणोंवाले (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नक्षत्रोंमें उत्पन्न कन्याकी नाड़ी जाननेके लिये मृगशिरासे लेकर रोहिणीतक पाँच पर्वोंपर क्रम-उत्क्रम⁴ से गिने। यदि वर और वधू दोनोंके नक्षत्र एक पर्वपर पड़ें तो वे उनके लिये घातक हैं और भिन्न पर्वोंपर पड़ें तो उन्हें शुभ समझना चाहिये॥ ५०९ १/२ ॥
१. राशियोंके वर्णको स्पष्ट समझनेके लिये यह कोष्ठ देखें—
| मीन | मेष | वृष | मिथुन |
|---|---|---|---|
| कर्क | सिंह | कन्या | तुला |
| वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ |
| ब्राह्मण | क्षत्रिय | वैश्य | शूद्र |
२. त्रिनाडी—
| १ | अश्विनी | आर्द्रा | पुनर्वसु | उत्तराफाल्गुनी | हस्त | ज्येष्ठा | मूल | शतभिषा | पूर्व भाद्रपद |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | भरणी | मृगशिरा | पुष्य | पूर्वाफाल्गुनी | चित्रा | अनुराधा | पूर्वाषाढ़ | धनिष्ठा | उत्तर भाद्रपद |
| ३ | कृत्तिका | रोहिणी | आश्लेषा | मघा | स्वाती | विशाखा | उत्तराषाढ़ | श्रवण | रेवती |
३. चतुर्नाडी—
| १ | कृत्तिका | मघा | पूर्वाफाल्गुनी | ज्येष्ठा | मूल | उत्तर भाद्रपद | रेवती |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | रोहिणी | आश्लेषा | उत्तराफाल्गुनी | अनुराधा | पूर्वाषाढ़ | पूर्व भाद्रपद | अश्विनी |
| ३ | मृगशिरा | पुष्य | हस्त | विशाखा | उत्तराषाढ़ | शतभिषा | भरणी |
| ४ | आर्द्रा | पुनर्वसु | चित्रा | स्वाती | श्रवण | धनिष्ठा | × |
४. पञ्चनाडी—
| १ | मृगशिरा | चित्रा | स्वाती | शतभिषा | पूर्व भाद्रपद | × |
|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | आर्द्रा | हस्त | विशाखा | धनिष्ठा | उत्तर भाद्रपद | × |
| ३ | पुनर्वसु | उत्तराफाल्गुनी | अनुराधा | श्रवण | रेवती | × |
| ४ | पुष्य | पूर्वाफाल्गुनी | ज्येष्ठा | उत्तराषाढ़ | अश्विनी | रोहिणी |
| ५ | आश्लेषा | मघा | मूल | पूर्वाषाढ़ | भरणी | कृत्तिका |