संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३८१
तिथियोंमें, रविवार, मङ्गलवार तथा चर लग्नको छोड़कर अन्य वारों और अन्य (स्थिर या द्विस्वभाव) लग्नोंमें, जब पापग्रह लग्नमें न हो, अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो; शुभ राशि लग्न हो और उसमें शुभ नवमांश हो, उस लग्नमें शुभग्रहका संयोग या दृष्टि हो; ऐसे समय (सुलग्न)-में ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराते हुए माङ्गलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियोंके मङ्गलगीत आदिके साथ मुहूर्त बतानेवाले दैवज्ञ (ज्योतिषके विद्वान् ब्राह्मण) के पूजन (सत्कार)-पूर्वक कुक्षिस्थानमें शंकुकी स्थापना करे। लग्नसे केन्द्र और त्रिकोणमें शुभ ग्रह तथा ३, ६, ११ में पापग्रह और चन्द्रमा हो तो यह शंकुस्थापन श्रेष्ठ है॥५७३—५७९½॥
घरके छः भेद होते हैं—१-एकशाला, २-द्विशाला, ३-त्रिशाला, ४-चतुश्शाला, ५-सप्तशाला तथा ६- दशशाला। इन छहों शालाओंमेंसे प्रत्येकके १६ भेद होते हैं। उन सब भेदोंके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—१-ध्रुव, २-धान्य, ३-जय, ४-नन्द, ५-खर, ६-कान्त, ७-मनोरम, ८ सुमुख, ९ दुर्मुख, १० क्रूर, ११ शत्रुद, १२ स्वर्णद, १३ क्षय, १४ आक्रन्द, १५ विपुल और १६ वाँ विजय नामक गृह होता है। चार अक्षरोंके प्रस्तारके भेदसे क्रमशः इन गृहोंकी गणना करनी चाहिये॥५८०—५८२½॥
(प्रस्तारभेद—) प्रथम ४ गुरु (ऽ) चिह्न लिखकर उनमें प्रथम गुरुके नीचे लघु (।) चिह्न लिखे। फिर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकारके गुरु या लघु चिह्न लिखना चाहिये। फिर उसके नीचे (तीसरी पङ्क्तिमें) प्रथम गुरु चिह्नके नीचे लघु चिह्न लिखकर आगे (दाहिने भागमें) जैसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसा ही चिह्न लिखे तथा पीछे (बायें भागमें) गुरु चिह्नसे पूरा करे। इसी प्रकार पुनः-पुनः तबतक लिखता जाय जबतक कि पंक्ति (प्रस्तार)-में सब चिह्न लघु न हो जाय। इस प्रकार चार दिशा होनेके कारण ४ अक्षरोंसे १६ भेद होते हैं। प्रत्येक भेदमें चारों चिह्नोंको प्रदक्षिणक्रमसे पूर्व आदि दिशा समझकर जहाँ-जहाँ लघु चिह्न पड़े, वहाँ-वहाँ घरका द्वार और अलिन्द (द्वारके आगेका भाग=चबूतरा) बनाना चाहिये। इस प्रकार पूर्वादि दिशाओंमें अलिन्दके भेदोंसे १६ प्रकारके घर होते हैं*॥५८३-५८४½॥
१.प्रस्तारस्वरूप—
| संख्या | स्वरूप: पूर्व, | स्वरूप: दक्षिण, | स्वरूप: पश्चिम, | स्वरूप: उत्तर | नाम | द्वारकी दिशा |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ऽ | ऽ | ऽ | ऽ | ध्रुव | ऊर्ध्व (ऊपर) |
| २ | । | ऽ | ऽ | ऽ | धान्य | पूर्व |
| ३ | ऽ | । | ऽ | ऽ | जय | दक्षिण |
| ४ | । | । | ऽ | ऽ | नन्द | पूर्व-दक्षिण |
| ५ | ऽ | ऽ | । | ऽ | खर | पश्चिम |
| ६ | । | ऽ | । | ऽ | कान्त | पूर्व-पश्चिम |
| ७ | ऽ | । | । | ऽ | मनोरम | दक्षिण-पश्चिम |
| ८ | । | । | । | ऽ | सुमुख | पूर्व-दक्षिण-पश्चिम |
| ९ | ऽ | ऽ | ऽ | । | दुर्मुख | उत्तर |
| १० | । | ऽ | ऽ | । | क्रूर | पूर्व-उत्तर |
| ११ | ऽ | । | ऽ | । | शत्रुद | दक्षिण-उत्तर |
| १२ | । | । | ऽ | । | स्वर्णद | पूर्व-दक्षिण-उत्तर |
| १३ | ऽ | ऽ | । | । | क्षय | पश्चिम-उत्तर |
| १४ | । | ऽ | । | । | आक्रन्द | पूर्व-पश्चिम-उत्तर |
| १५ | ऽ | । | । | । | विपुल | दक्षिण-पश्चिम-उत्तर |
| १६ | । | । | । | । | विजय | पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तर |