भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 770 में से

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पृष्ठ 385
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | ३८३ ---|---

पूजनीय होते हैं। उन ४५ देवताओंके स्थान और नामका क्रमशः वर्णन करता हूँ। किनारेके बत्तीस कोष्ठोंमें ईशान कोणसे आरम्भ करके क्रमशः बत्तीस देवता पूज्य हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-कृपीट योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त, ३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश ८, वायु ९, पूषा १०, अनृत (वितथ) ११, गृहक्षत^१ १२, यम १३, गन्धर्व १४, भृङ्गराज १५, मृग १६, पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्प-दन्त २०, वरुण २१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा^२ २४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८, सोम २९, सर्प ३०, अदिति ३१ और दिति ३२,- ये चारों किनारोंके देवता हैं। ईशान, अग्नि, नैर्ऋत्य और वायुकोणके देवोंके समीप क्रमशः आप ३३, सावित्र ३४, जय ३५, तथा रुद्र ३६ के पद हैं। ब्रह्माके चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमशः अर्यमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९, विबुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, पृथ्वीधर ४३, आपवत्स ४४ हैं और मध्यके नव पदोंमें (४५) ब्रह्माजीको स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार सब पदोंमें ये पैंतालीस देवता पूजनीय होते हैं। जैसे ईशान-कोणमें आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति-ये पाँच देव एकपद होते हैं, उसी प्रकार अन्य कोणोंके पाँच-पाँच देवता भी एक-पदके भागी हैं। अन्य जो बाह्य-पङ्क्तिके (जयन्त, इन्द्र आदि) बीस देवता हैं, वे सब द्विपद (दो-दो पदोंके भागी) हैं तथा ब्राह्मसे पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये चार देवता हैं, वे त्रिपद (तीन-तीन पदोंके भागी) हैं, अतः वास्तु-विधिके ज्ञाता विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ब्रह्माजीसहित इन एकपद्, द्विपद तथा त्रिपद देवताओंका वास्तुमन्त्रों-द्वारा दूर्वा, दही, अक्षत, फूल, चन्दन, धूप, दीप और नैवेद्यादिसे विधिवत् पूजन करे। अथवा ब्राह्ममन्त्रसे आवाहनादि षोडश (या पञ्च) उपचारोंद्वारा उन्हें दो श्वेत वस्त्र समर्पित करे^३॥६००-६१३॥


१-२. अन्य संहिताओंमें १२ वाँ बृहत्क्षत; २४ वाँ पापयक्ष्मा कहा गया है।
३. एकाशीतिपद वास्तुचक्र-

शिखी १पर्जन्य २जयन्त ३इन्द्र ४सूर्य ५सत्य ६भृश ७आकाश ८वायु ९
दिति ३२आप ३३जयन्तइन्द्रसूर्यसत्यभृशसावित्र ३४पूषा १०
अदिति ३१अदिति४४ आपवत्सअर्यमा३७ अर्यमाअर्यमा३८ सवितावितथवितथ ११
सर्प ३०सर्पपृथ्वीधरविवस्वान्गृहक्षतगृहक्षत १२
सोम २९सोमपृथ्वीधर ४३४५ ब्रह्माविवस्वान् ३९यमयम १३
भल्लाटक २८भल्लाटकपृथ्वीधरविवस्वान्गन्धर्वगन्धर्व १४
मुख्य २७मुख्यराजयक्ष्मा ४२मित्रमित्र ४१मित्रविबुधाधिप ४०भृङ्गभृङ्ग १५
अहि २६रुद्र ३६शेषअसुरवरुणपुष्पदन्तसुग्रीवजय ३५मृग १६
रोग २५राजयक्ष्मा २४शेष २३असुर २२वरुण २१पुष्पदन्त २०सुग्रीव १९दौवारिक १८पितर १७
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