संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० * संक्षिप्त नारदपुराण *
सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपः ॥
'रथोद्धता'—(-में रगण, नगण, रगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं—)
उदाहरण—
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रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम्।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना ॥
'स्वागता'—(-में रगण, नगण, भगण, दो गुरु होते हैं—)
उदाहरण—
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कुन्ददामकृतकौतुकवेषो गोपगोधनवृत्तो यमुनायाम्।
नन्दसूनुरनघे तव वत्सो नर्मदः प्रणयिनां विजहार॥
इनके सिवा सुमुखी, वातोर्मी, श्रीभ्रमर-विलसित, वृन्ता, भद्रिका, श्येनिका, मौक्तिकमाला तथा उपस्थिता आदि और भी अनेक छन्द हैं। इनके लक्षण, उदाहरण अन्यत्र देखने चाहिये।
(१२) जिसके चारों चरण बारह-बारह अक्षरोंसे बनते हैं, उस छन्दसमुदायका नाम 'जगती' है। प्रस्तारसे इसके ४०९६ भेद होते हैं। इसके भेदोंमेंसे केवल वंशस्थ, इन्द्रवंशा, द्रुतविलम्बित, तोटक, भुजङ्गप्रयात, स्रग्विणी, प्रमिताक्षरा और वैश्वदेवी छन्दोंके ही लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं—
'वंशस्थ'—(-में जगण, तगण, जगण तथा रगण—ये चार गण होते हैं। पादके अन्तमें यति है।)
उदाहरण—
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सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥
'इन्द्रवंशा'—(-में तगण, तगण, जगण तथा रगण प्रयुक्त होते हैं तथा पादान्तमें यति या विराम है। वंशस्थके प्रत्येक चरणका पहला अक्षर गुरु कर दिया जाय तो वह इन्द्रवंशा छन्द हो जाता है।)
उदाहरण—
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यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम्।
लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥
वंशस्थ और इन्द्रवंशाके चरणोंके मेलसे भी चौदह प्रकारकी 'उपजाति' बनती है। पूर्वोक्त चक्रमें 'उ' के स्थानमें 'वं' लिख दिया जाय तो वह इन्द्रवंशा तथा वंशस्थकी उपजातिका प्रस्तार-चक्र हो जायगा। इन चौदह उपजातियोंके नाम इस प्रकार हैं—
१- वैरासिकी, २- रताख्यानकी, ३- इन्दुमा, ४- पुष्टिदा, ५- उपमेया अथवा रमणीयक, ६- सौरभेयी, ७- शीलातुरा, ८- वासन्तिका, ९- मन्दहासा, १०- शिशिरा, ११- वैधात्री, १२- शङ्खचूडा, १३- रमणा तथा १४- कुमारी। इन सबके उदाहरण ग्रन्थान्तरोंमें उपलब्ध होते हैं। यहाँ प्रथम उपजातिका एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें प्रथम चरण वंशस्थका और शेष तीन चरण इन्द्रवंशाके हैं।
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किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः।
येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥
'द्रुतविलम्बित' (-में नगण, भगण, भगण, रगण—ये चार गण होते हैं। पादान्तमें यति होती है।)
उदाहरण—
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विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।