संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 770 में से
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उदाहरण— S S । S । । । S । । S । S S या दोहनेऽवहनने मथनोपलेपप्रेङ्खेऽखनाभर्भुदितोक्षणमार्जनादौ। गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥
इसके सिवा असंबाधा, अपराजिता तथा प्रहरणकलिता आदि और भी अनेक भेद हैं। उनमेंसे प्रहरणकलिताका उदाहरण यहाँ दिया जाता है, प्रहरणकलितामें २ नगण, १ भगण, १ नगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं। सात-सात अक्षरोंपर विराम होता है।
यथा— । । । । । । । S । । । । । । S सुरमुनिमनुजैरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणाम्। प्रणमत महिषासुरवधकुपितां प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम्॥
(१५) पंद्रह-पंद्रह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दोंका नाम ‘अतिशक्वरी’ है। प्रस्तारसे इसके ३२७६८ भेद होते हैं। इन भेदोंमें चन्द्रावर्ता और मालिनी—ये दो ही यहाँ बताये जाते हैं। ४ नगण और १ सगणसे ‘चन्द्रावर्ता’ छन्द बनता है। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम है। यदि छः और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम ‘माला’ होता है। इसी तरह आठ और सात अक्षरोंपर विराम होनेसे उसकी ‘मणिनिकर’ संज्ञा होती है। चन्द्रावर्ताका उदाहरण इस प्रकार है—
। । । । । । । । । । । । । । S पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् । विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विशति हरिरिह शरदि शुभसरः॥
‘मालिनी’—(—में २ नगण, १ मगण और २ भगण होते हैं। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम होता है—)
उदाहरण— । । । । । । S S S । S S । S S असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी। लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥
(१६) सोलह-सोलह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायका नाम ‘अष्टि’ है। प्रस्तारसे इसके भेदोंकी संख्या ६५५३६ होती है। इसके भेदोंमें दोके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। एकका नाम है ऋषभगजविलसित और दूसरेका नाम है वाणिनी। ऋषभगजविलसितमें भगण, रगण, तीन नगण तथा एक गुरु होते हैं। सात, नौ अक्षरोंपर विराम होता है।
S । । S । S । । । । । । । । S यो हरिरुच्चखान खरतरनखशिखरैर्दुर्जयदैत्यसिंहसुविकटहृदयतटम्। किं न्विह चित्रमेष यदखिलमपहत्वान् कंसनिदेशदृप्यदृषभगजविलसितम्॥
‘वाणिनी’— (में नगण, जगण, भगण, जगण, रगण तथा १ गुरु होते हैं—)
उदाहरण— । । । । S । S । । । S । S । S S स्फुरतु ममाननेऽद्य न नु वाणि नीतिरम्यं तव चरणप्रसादपरिपाकजः कवित्वम्। भवजलराशिपारकरणक्षमं मुकुन्दं सततमहं स्तवैः स्वरचितैः स्तवानि नित्यम्॥
(१७) सत्रह-सत्रह अक्षरोंके चार चरणोंवाले छन्दसमूहका नाम ‘अत्यष्टि’ है। प्रस्तारसे इसकी संख्या १३१०७२ होती है। इसके भेदोंमेंसे केवल हरिणी, पृथ्वी, वंशपत्रपतित, मन्दाक्रान्ता और शिखरिणीके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं।
‘हरिणी’ (के प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु होते हैं। ६, ४, ७ अक्षरोंपर विराम होता है।)
उदाहरण— । । । । । S S S S S । S । । S । S न समरसनाः काले भोगाश्चलं धनयौवनं कुरुत सुकृतं यावन्नेयं तनुः प्रविशीर्यते॥ किमपि कलना कालस्येयं प्रभावति सत्वरा तरुणहरिणीसंत्रस्तेव प्लवप्रविसारिणी॥
‘पृथ्वी’ (के प्रत्येक पादमें जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं। आठ-नौ अक्षरोंपर विराम होता है।)
उदाहरण— । S । । । S । S । । S । S S । S हताः समितिशत्रवस्त्रिभुवने प्रकीर्णं यशः कृतश्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः। त्वया कृतपरिग्रहे रघुपतेऽद्य सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता॥