संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०६ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
|---|
उन्हें जोड़कर उसमें एक और मिला दे तथा वही उद्दिष्ट स्वरूपकी संख्या बतावे। ऐसा पुराणवेत्ता विद्वानोंका कथन है^१। (अमुक छन्दके प्रस्तारमें एक गुरुवाले या एक लघुवाले, दो लघुवाले या दो गुरुवाले, तीन लघुवाले या तीन गुरुवाले भेद कितने हो सकते हैं; यह पृथक्-पृथक् जाननेकी जो प्रक्रिया है, उसे 'एकद्व्यादिलगक्रिया' कहते हैं।) छन्दके अक्षरोंकी जो संख्या हो, उसमें एक अधिक जोड़कर उतने ही एकाङ्क ऊपर-नीचेके क्रमसे लिखे। उन एकाङ्कोंको ऊपरकी अन्य पङ्क्तिमें जोड़ दे; किंतु अन्त्यके समीपवर्ती अङ्कको न जोड़े और ऊपरके एक-एक अङ्कको त्याग दे। ऊपरके सर्व गुरुवाले पहले भेदसे नीचेतक गिने। इस रीतिसे प्रथम भेद सर्वगुरु, दूसरा भेद एक गुरु और तीसरा भेद द्विगुरु होता है। इसी तरह नीचेसे ऊपरकी ओर ध्यान देनेसे सबसे नीचेका सर्वलघु, उसके ऊपरका एक लघु, तीसरा भेद | द्विलघु इत्यादि होता है। इस प्रकार 'एकद्व्यादिलगक्रिया' जाननी चाहिये।^२ लगक्रियाके अङ्कोंको जोड़ देनेसे उस छन्दके प्रस्तारकी पूरी संख्या ज्ञात हो जाती है। यही संख्यान प्रत्यय कहलाता है, अथवा उद्दिष्टपर दिये हुए अङ्कोंको जोड़कर उसमें एकका योग कर दिया जाय तो वह भी प्रस्तारकी पूरी संख्याको प्रकट कर देता है^३। छन्दके प्रस्तारको अङ्कित करनेके लिये जो स्थानका नियमन किया जाता है, उसे अध्वयोग प्रत्यय कहते हैं। प्रस्तारकी जो संख्या है, उसे दूना करके एक घटा देनेसे जो अङ्क आता है, उतने ही अंगुलका उसके प्रस्तारके लिये अध्वा या स्थान कहा गया है॥१६-२०॥ मुने! यह छन्दोंका किंचित् लक्षण बताया गया है। प्रस्तारद्वारा प्रतिपादित होनेवाले उनके भेद-प्रभेदोंकी संख्या अनन्त है॥२१॥<br>(पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५७)
१-जैसे कोई पूछे कि चार अक्षरके पादवाले छन्दमें जहाँ प्रथम तीन गुरु और अन्तमें एक लघु हो तो उसकी संख्या क्या है अर्थात् वह उस छन्दका कौन-सा भेद है? इसको जाननेके लिये पहले उद्दिष्टके गुरु-लघुको निम्नाङ्कित रीतिसे अङ्कित करके उनके ऊपर क्रमशः द्विगुण अङ्क स्थापित करे—
| १ | २ | ४ | ८ |
|---|---|---|---|
| ऽ | ऽ | ऽ | । |
तत्पश्चात् केवल लघुके अङ्क ८ में एक और जोड़ दिया गया तो ९ हुआ। यही उद्दिष्टकी संख्या है। अर्थात् वह उस छन्दका नवाँ भेद है।
२. निम्नाङ्कित कोष्ठकसे यह बात स्पष्ट हो जाती है—
अर्थात् चार अक्षरवाले छन्दके प्रस्तारमें ४ लघुवाला १ भेद, एक गुरु तीन लघुवाला ४ भेद, २ गुरु और दो लघुवाला ६ भेद, तीन गुरु और १ लघुवाला ४ भेद और चार गुरुवाला १ भेद होगा।
३. यथा—चार अक्षरके प्रस्तारमें लगक्रियाके अङ्क १+४+६+४+१ होते हैं, इनका योग सोलह होता है। अतः चार अक्षरके पादवाले छन्दके सोलह भेद होंगे अथवा उद्दिष्टके अङ्क हैं १+२+४+८ इसका योग हुआ १५, इनमें एकका योग करनेसे प्रस्तार संख्या १६ प्रकट हो जाती है।
\ १ \ ४ऽ
\ \
\ १ \ ४ \ ३ऽ।
\ \ \
\ १ \ ३ \ ६ \ २ऽ२।
\ \ \ \
\ १ \ २ \ ३ \ ४ \ १ऽ३।
\ \ \ \ \
| १ | १ | १ | १ | १ \ ४।