भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 422
४२०* संक्षिप्त नारदपुराण *

तुम ज्ञानी और साक्षात् मेरे स्वरूप हो। ब्रह्मन्! तुमने पहले श्वेतद्वीपमें जो मेरा स्वरूप देखा है, वह मैं ही हूँ। सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाके लिये मैं वहाँ स्थित हूँ। मेरा वही स्वरूप भिन्न-भिन्न अवतार धारण करनेके लिये जाता है। महाभाग ! मोक्षधर्मका निरन्तर चिन्तन करनेसे तुम सिद्ध हो गये हो। जैसे वायु तथा सूर्य आकाशमें विचरण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी समस्त श्रेष्ठ लोकोंमें भ्रमण कर सकते हो। तुम नित्य मुक्तस्वरूप हो। मैं ही सबको शरण देनेवाला हूँ। संसारमें मेरे प्रति भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है। उस भक्तिको प्राप्त कर लेनेपर और कुछ पाना शेष नहीं रहता। (वह तुमको प्राप्त हो गयी) बदरिकाश्रममें नर-नारायण ऋषि कल्पान्त कालतकके लिये तपस्यामें स्थित हैं। उनकी आज्ञासे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता व्यास भागवत-शास्त्रका सम्पादन करेंगे। अतः तुम पृथ्वीपर जाओ और उस शास्त्रका अध्ययन करो। इस समय वे गन्धमादन पर्वतपर तपस्या करते हैं। | नारदजी ! भगवान्‌के ऐसा कहनेपर शुकदेवजीने उन चार भुजाधारी श्रीहरिको नमस्कार किया और वे पिताके समीप लौट गये। तदनन्तर शुकदेवको अपने निकट देख परम प्रतापी पराशरनन्दन भगवान् व्यासका मन प्रसन्न हो गया। वे पुत्रको पाकर तपस्यासे निवृत्त हो गये। फिर भगवान् नारायण और नरश्रेष्ठ नरको नमस्कार करके शुकदेवजीके साथ अपने आश्रमपर आये। मुनीश्वर नारद ! तुम्हारे मुखसे भगवान् नारायणका आदेश पाकर उन्होंने अनेक प्रकारके शुभ उपाख्यानोंसे युक्त दिव्य भागवतसंहिता बनायी, जो वेदके तुल्य माननीय तथा भगवद्भक्तिको बढ़ानेवाली है। व्यासजीने वह संहिता अपने निवृत्तिपरायण पुत्र शुकदेवको पढ़ायी। व्यासनन्दन भगवान् शुक यद्यपि आत्माराम हैं तथापि उन्होंने भक्तोंको सदा प्रिय लगनेवाली उस संहिताका बड़े उत्साहसे अध्ययन किया। अनघ ! इस प्रकार ये मोक्षधर्म बतलाये गये, जो पाठकों और श्रोताओंके हृदयमें भगवान्‌की भक्ति बढ़ानेवाले हैं।


१. शान्तं प्रसन्नवदनं पीतकौशेयवाससम् । शङ्खचक्रगदापद्मूर्तिमद्भिरुपासितम् ॥
वक्षःस्थलस्थया लक्ष्म्या कौस्तुभेन विराजितम् । कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकटकाङ्गदभूषितम् ॥
भ्राजत्किरीटवलयं मणिनूपुरशोभितम् । ददर्श सिद्धनिकरैः सेव्यमानमहर्निशम् ॥
तं दृष्ट्वा भक्तिभावेन तुष्टाव मधुसूदनम् । नमस्ते वासुदेवाय सर्वलोकैकसाक्षिणे ॥
जगद्बीजस्वरूपाय पूर्णाय निभृतात्मने । हरये वासुकिस्थाय श्वेतद्वीपनिवासिने ॥
हंसाय मत्स्यरूपाय वाराहतनुधारिणे । नृसिंहाय ध्रुवेज्याय सांख्ययोगेश्वराय च ॥
चतुःसनाय कूर्माय पृथवे स्वसुखात्मने । नाभेयाय जगद्धात्रे विधात्रेऽन्तकराय च ॥
भार्गवेन्द्राय रामाय राघवाय पराय च । कृष्णाय वेदकर्त्रे च बुद्धकल्किस्वरूपिणे ॥
चतुर्व्यूहाय वेद्याय ध्येयाय परमात्मने । नरनारायणाख्याय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥
ऋतधाम्ने विधाम्ने च सुपर्णाय स्वरोचिषे । ऋभवे सुव्रताख्याय सुधाम्ने चाजिताय च ॥
विश्वरूपाय विश्वाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणे । यज्ञाय यज्ञभोक्त्रे च स्थविष्ठायाणवेऽर्थिने ॥
आदित्यसोमनेत्राय सहओजोबलाय च । ईज्याय साक्षिणेऽजाय बहुशीर्षाङ्घ्रिबाहवे ॥
श्रीशाय श्रीनिवासाय भक्तवश्याय शार्ङ्गिणे । अष्टप्रकृत्यधीशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ॥
बृहदारण्यवेद्याय हृषीकेशाय वेधसे । पुण्डरीकनिभाक्षाय क्षेत्रज्ञाय विभासिने ॥
गोविन्दाय जगत्कर्त्रे जगन्नाथाय योगिने । स्त्याय सत्यसंधाय वैकुण्ठायाच्युताय च ॥
अधोक्षजाय धर्माय वामनाय त्रिधातवे । धृतार्चिषे विष्णवे तेऽनन्ताय कपिलाय च ॥
विरिञ्चये त्रिककुदे ऋग्यजुःसामरूपिणे । एकशृङ्गाय च शुचिश्रवसे शास्त्रयोनये ॥
वृषाकपय ऋद्धाय प्रभवे विश्वकर्मणे । भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय दैत्यघ्ने निर्गुणाय च ॥
निरञ्जनाय नित्याय ह्यव्ययायाक्षराय च । नमस्ते पाहि मामीश शरणागतवत्सल ॥
(ना० पूर्व० ६२ । ४७-६५)