भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 770 में से

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पृष्ठ 443
  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४४१ ---|---

अक्षर ‘आ’ का मुखमें, दो अक्षर ‘इ’ और ‘ई’ का क्रमशः दाहिने और बाँयें नेत्रमें और दो अक्षर ‘उ’, ‘ऊ’ का क्रमशः दाहिने-बायें कानमें न्यास करे। दो अक्षर ‘ऋ’, ‘ॠ’ का दायीं-बायीं नासिकामें, दो अक्षर ‘ऌ’, ‘ॡ’ का दायें-बायें कपोलमें, दो अक्षर ‘ए’, ‘ऐ’ का ऊपर-नीचेके ओष्ठमें, दो अक्षर ‘ओ’, ‘औ’ का ऊपर-नीचेकी दन्तपंक्तिमें, एक अक्षर ‘अं’ का जिह्वामूलमें तथा एक अक्षर ‘अः’ का ग्रीवामें न्यास करे। दाहिनी बाँहमें कवर्गका और बायीं बाँहमें चवर्गका न्यास करे। टवर्ग और तवर्गका दोनों पैरोंमें तथा ‘प’ और ‘फ’ का दोनों कुक्षियोंमें न्यास करे। पृष्ठवंशमें ‘ब’ का, नाभिमें ‘भ’ का और हृदयमें ‘म’ का न्यास करे। ‘य’ आदि सात अक्षरोंका शरीरकी सात धातुओंमें, ‘ह’ का प्राणमें तथा ‘ळ’ का आत्मामें न्यास करे। ‘क्ष’ का क्रोधमें न्यास करना चाहिये। इस प्रकार क्रमसे मातृका वर्णोंका न्यास करके मनुष्य भगवान् विष्णुकी पूजामें समर्थ होता है।

शैव-मातृका-न्यास

[ भगवान् शिवके उपासकको केशव-कीर्त्यादि मातृका-न्यासकी भाँति श्रीकण्ठेशादि मातृका-न्यास करना चाहिये।] पूर्णोदरीके साथ श्रीकण्ठेशका, विरजाके साथ अनन्तेशका, शाल्मलीके साथ सूक्ष्मेशका, लोलाक्षीके साथ त्रिमूर्तीशका, वर्तुलाक्षीके साथ महेशका और दीर्घघोणाके साथ अर्धीशका न्यास करे*। दीर्घमुखीके साथ भारभूतीशका, गोमुखीके साथ तिथीशका, दीर्घजिह्वाके साथ स्थाण्वीशका, कुण्डोदरीके साथ हरेशका, ऊर्ध्वकेशीके साथ झिण्टीशका, विकृतास्याके साथ भौतिकेशका, ज्वालामुखीके साथ सद्योजातेशका, उल्कामुखीके साथ अनुग्रहेशका, आस्थाके साथ अक्रूरका, विद्याके साथ महासेनका, महाकालीके साथ क्रोधीशका, सरस्वतीके साथ चण्डेशका, सिद्धगौरीके साथ पञ्चान्तकेशका, त्रैलोक्यविद्याके साथ शिवोत्तमेशका, मन्त्र-शक्तिके साथ एकरुद्रेशका, कमठीके साथ कूर्मेशका, भूतमाताके साथ एकनेत्रेशका, लम्बोदरीके साथ चतुर्वक्त्रेशका, द्राविणीके साथ अजेशका, नागरीके साथ सर्वेशका, खेचरीके साथ सोमेशका, मर्यादाके साथ लाङ्गलीशका, दारुकेशके साथ रूपिणीका तथा वीरिणीके साथ अर्धनारीशका न्यास करना चाहिये। काकोदरीके साथ उमाकान्त (उमेश)-का और पूतनाके साथ आषाढीशका न्यास करे। भद्रकालीके साथ दण्डीशका, योगिनीके साथ अत्रीशका, शङ्खिनीके साथ मीनेशका, तर्जनीके साथ मेषेशका, कालरात्रिके साथ लोहितेशका, कुब्जनीके साथ शिखीशका, कपर्दिनीके साथ छलगण्डेशका, वज्राके साथ द्विरण्डेशका, जयाके साथ महाबलेशका, सुमुखेश्वरीके साथ बलीशका, रेवतीके साथ भुजङ्गेशका, माध्वीके साथ पिनाकीशका, वारुणीके साथ खड्गीशका, वायवीके साथ वकेशका, विदारणीके साथ श्वेतोत्केशका, सहजाके साथ भृग्वीशका, लक्ष्मीके साथ लकुलीशका, व्यापिनीके साथ शिवेशका तथा महामायाके साथ संवर्तकेशका न्यास करे। यह श्रीकण्ठमातृका कही गयी है। जहाँ ‘ईश’ पद न कहा गया हो, वहाँ सर्वत्र उसकी योजना कर लेनी चाहिये। इस श्रीकण्ठमातृका-न्यासके दक्षिणामूर्ति ऋषि और गायत्री छन्द कहा गया है। अर्धनारीश्वर देवता है और सम्पूर्ण मनोरथोंकी प्राप्तिके लिये इसका विनियोग कहा गया है।


उनका निर्देश मूलमें किया जा रहा है। उन सबके लिये उपर्युक्त रीतिसे वाक्ययोजना करनी चाहिये। तन्त्रमें द्विवचन-विभक्ति तथा शक्तियोंका अन्तमें प्रयोग देखा जानेके कारण द्वन्द्वसमास करके भी स्त्री-लिङ्गका पूर्वनिपात नहीं किया गया।
* उदाहरणके लिये वाक्यप्रयोग इस प्रकार है—ह्र् सौं अं श्रीकण्ठेशपूर्णोदरीभ्यां नमः (ललाटे)। ह्र् सौं आं अनन्तेशविरजाभ्यां नमः (मुखवृत्ते) इत्यादि।