संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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| 'स्वाहा' 'पाञ्चजन्याय' तथा हृदय (नमः पद) है। पूरा मन्त्र इस प्रकार समझना चाहिये—'ॐ क्लीं महाजलचराय हुं फट् स्वाहा पाञ्चजन्याय नमः।' इसके बाद 'ॐ अर्कमण्डलाय द्वादशकलात्मने······ देवार्घ्यपात्राय नमः' इस तेईस अक्षरवाले मन्त्रसे शङ्खकी पूजा करनी चाहिये। (इष्टदेवका नाम जोड़नेसे अक्षर-संख्या पूरी होती है। उस मन्त्रसे पूजन करनेके अनन्तर उसमें सूर्यकी बारह कलाओंका क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् विलोमक्रमसे मूलमातृका वर्णोंका उच्चारण करते हुए शुद्ध जलसे शङ्खको भर दे और उसकी निम्नाङ्कित मन्त्रसे पूजा | करे—'ॐ सोममण्डलाय षोडशकलात्मने देवार्घ्यामृताय नमः'। अर्घ्यपूजनके लिये यही मन्त्र है। फिर उस जलमें चन्द्रमाकी सोलह कलाओंकी पूजा करे। तदनन्तर पहले बताये अनुसार 'गङ्गे च यमुने चैव' इत्यादि मन्त्रसे सब तीर्थोंका उसमें आवाहन करके धेनुमुद्राद्वारा¹ उसका अमृतीकरण² करे और मत्स्यमुद्राद्वारा³ उसे आच्छादित करे। फिर कवच (हुं बीज) द्वारा अवगुण्ठन⁴ करके पुनः अस्त्र (फट्)-द्वारा उसकी रक्षा करे। तदनन्तर इष्टदेवका चिन्तन करके मुद्रा प्रदर्शन करे। शङ्ख⁵, मुसल⁶, चक्र⁷, परमीकरण⁸, महामुद्रा⁹, तथा योनिमुद्राका¹⁰, विद्वान् |
१. धेनुमुद्राका लक्षण इस प्रकार है—
वामाङ्गुलीनां मध्येषु दक्षिणाङ्गुलिकास्तथा । संयोज्य तर्जनीं दक्षां मध्यमानामयोस्तथा ॥
दक्षमध्यमयोर्वामां तर्जनीं च नियोजयेत् । वामयानामया दक्षकनिष्ठां च नियोजयेत् ॥
दक्षयानामया वामां कनिष्ठां च नियोजयेत् । विहिताधोमुखी चैषा धेनुमुद्रा प्रकीर्तिता ॥
'बायें हाथकी अंगुलियोंके बीचमें दाहिने हाथकी अंगुलियोंको संयुक्त करके दाहिनी तर्जनीको मध्यमाके बीचमें लगावे। दाहिने हाथकी मध्यमामें बायें हाथकी तर्जनीको मिलावे। फिर बायें हाथकी अनामिकासे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका और दाहिने हाथकी अनामिकाके साथ बायें हाथकी कनिष्ठिकाको संयुक्त करे। फिर इन सबका मुख नीचेकी ओर करे—यही धेनुमुद्रा कही गयी है।'
२. अमृतीकरणकी विधि यह है—'वं' इस अमृतबीजका उच्चारण करके उस धेनुमुद्राको दिखावे। ३. मत्स्यमुद्रा इस प्रकार है—बायें हाथके पृष्ठ भागपर दाहिने हाथकी हथेली रखे। दोनों अंगूठोंको फैलाये रखे। ४. बायीं मुट्ठी इस प्रकार बाँध ले, जिससे तर्जनी अंगुली निकली रहे, इस प्रकारकी मुट्ठीको शङ्खके ऊपर घुमाना अवगुण्ठनी मुद्रा है। ५. शङ्खमुद्राका लक्षण इस प्रकार है—बायें अंगूठेको दाहिनी मुट्ठीसे पकड़ ले। मुट्ठी उत्तान करके अँगूठेको फैला दे। बायें हाथकी चारों अंगुलियोंको सटी हुई रखे और उन्हें फैलाकर दाहिने अँगूठेसे सटा दे। यह शङ्खकी मुद्रा ऐश्वर्य देनेवाली है। ६. मुसलमुद्रा—
मुष्टिं कृत्वा तु हस्ताभ्यां वामस्योपरि दक्षिणम्। कुर्यान्मुसलमुद्रेयं सर्वविघ्नविनाशिनी ॥
दोनों हाथोंकी मुट्ठी बाँधकर बायींके ऊपर दाहिनी मुट्ठी रख दे। यह सब विघ्नोंका नाश करनेवाली मुसलमुद्रा कही गयी है।
७. चक्रमुद्रा—
हस्तौ च सम्मुखौ कृत्वा सुभुग्न सुप्रसारितौ। कनिष्ठाङ्गुष्ठको लग्नौ मुद्रैषा चक्रसंज्ञिका ॥
दोनों हाथोंको आमने-सामने करके उन्हें भलीभाँति फैलाकर मोड़ दे और दोनों कनिष्ठिकाओं तथा अँगूठोंको परस्पर सटा दे। यह चक्रमुद्रा है। ८. दोनों हाथोंकी अंगुलियोंको परस्पर सटाकर हाथोंको अलग रखे—यही परमीकरण मुद्रा है।
९. महामुद्रा—
अन्योन्यग्रथिताङ्गुष्ठा प्रसारितकराङ्गुली। महामुद्रेयमुदिता परमीकरणे बुधैः॥
अँगूठोंको परस्पर ग्रथित करके दोनों हाथोंकी अंगुलियोंको फैला दे। विद्वानोंने इसीको परमीकरणमें महामुद्रा कहा है। १०. दोनों हाथोंको उत्तान रखते हुए दायें हाथकी अनामिकासे बायें हाथकी तर्जनीको और बायें हाथकी