भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 770 में से

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पृष्ठ 448
४४६* संक्षिप्त नारदपुराण *

आत्मसंस्थमजं शुद्धं त्वामहं परमेश्वर।
अरण्यामिव हव्यांशं मूर्तावावाहयाम्यहम्॥
तवेयं हि महामूर्तिस्तस्यां त्वां सर्वगं प्रभो।
भक्तस्नेहसमाकृष्टं दीपवत्स्थापयाम्यहम्॥
सर्वान्तर्यामिणे देव सर्वबीजमयं शुभम्।
स्वात्मस्थाय परं शुद्धमासनं कल्पयाम्यहम्॥
अनन्या तव देवेश मूर्तिशक्तिरियं प्रभो।
सांनिध्यं कुरु तस्यां त्वं भक्तानुग्रहकारक॥
अज्ञानादुत मत्तत्वाद् वैकल्यात्साधनस्य च।
यद्यपूर्णं भवेत् कल्पं तथाप्यभिमुखो भव॥
दृशा पीयूषवर्षिण्या पूरयन् यज्ञविष्टरे।
मूर्ती वा यज्ञसम्पूत्यै स्थितो भव महेश्वर॥
अभक्तवाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रदूरायितद्युते ।
स्वतेजःपञ्जरेणाशु वेष्टितो भव सर्वतः॥
यस्य दर्शनमिच्छन्ति देवाः स्वाभीष्टसिद्धये।
तस्मै ते परमेशाय स्वागतं स्वागतं च मे॥
कृतार्थोऽनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम।
आगतो देवदेवेशः सुस्वागतमिदं पुनः॥
(ना० पूर्व० ६७। ३७-४५)

परमेश्वर! आप अपने-आपमें स्थित, अजन्मा एवं शुद्ध-बुद्ध-स्वरूप हैं। जैसे अरणीमें अग्नि छिपी हुई है, उसी प्रकार इस मूर्तिमें आप गूढरूपसे व्याप्त हैं, मैं आपका आवाहन करता हूँ। प्रभो! यह आपकी महामूर्ति है, मैं इसके भीतर आप सर्वव्यापी परमात्माको, जो कि भक्तके प्रति स्नेहवश स्वयं खिंच आये हैं, दीपकी भाँति स्थापित करता हूँ। देव! अपने अन्तःकरणमें स्थित आप सर्वान्तर्यामी प्रभुके लिये मैं सर्वबीजमयं, शुभ एवं शुद्ध आसन प्रस्तुत करता हूँ। देवेश! यह आपकी अनन्य मूर्ति-शक्ति है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले प्रभो! आप इसमें निवास कीजिये। अज्ञानसे, प्रमादसे अथवा साधनहीनताके कारण यदि मेरा यह अनुष्ठान अपूर्ण रह जाय तो भी आप अवश्य सम्मुख हों। महेश्वर! आप अपनी सुधावर्षिणी दृष्टिद्वारा सब त्रुटियोंको पूर्ण करते हुए यज्ञकी पूर्णताके लिये इस यज्ञासनपर अथवा मूर्तिमें स्थित होइये। आपका प्रकाश या तेज अभक्त जनोंके मन, वचन, नेत्र और कानसे कोसों दूर है। भगवन्! आप सब ओर अपने तेजःपुञ्जसे शीघ्र आवृत हो जाइये। देवतालोग अपने अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये सदा जिनका दर्शन चाहते हैं, उन्हीं आप परमेश्वरके लिये मेरा बारम्बार स्वागत है, स्वागत है। देवदेवेश्वर प्रभु आ गये। मैं कृतार्थ हो गया। मुझपर बड़ी कृपा हुई। आज मेरा जीवन सफल हो गया। मैं पुनः इस शुभागमनके लिये प्रभुका स्वागत करता हूँ।

पाद्य

यद्भक्तिलेशसम्पर्कात् परमानन्दसम्भवः।
तस्मै ते चरणाब्जाय पाद्यं शुद्धाय कल्प्यते॥ ४६॥
जिनकी लेशमात्र भक्तिका सम्पर्क होनेसे परमानन्दका समुद्र उमड़ आता है, आपके उन शुद्ध चरण-कमलोंके लिये पाद्य प्रस्तुत किया जाता है।

अर्घ्य

तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम्।
तापत्रयविनिर्मुक्त्यै तवार्घ्यं कल्पयाम्यहम्॥ ४८॥
देव! मैं तीन प्रकारके तापोंसे छुटकारा पानेके लिये आपकी सेवामें त्रितापहारी परमानन्द-स्वरूप दिव्य अर्घ्य अर्पण करता हूँ।

आचमनीय

वेदानामपि वेदाय देवानां देवतात्मने।
आचामं कल्पयामीश शुद्धानां शुद्धिहेतवे॥ ४७॥
भगवन्! आप वेदोंके भी वेद और देवताओंके भी देवता हैं। शुद्ध पुरुषोंकी भी परम शुद्धिके हेतु हैं। मैं आपके लिये आचमनीय प्रस्तुत करता हूँ।

मधुपर्क

सर्वकालुष्यहीनाय परिपूर्णसुखात्मने।
मधुपर्कमिदं देव कल्पयामि प्रसीद मे॥ ४९॥
देव! आप सम्पूर्ण कलुषतासे रहित तथा