भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 770 में से

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पृष्ठ 455
  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४५३ ---|---

न्यास करे अथवा आदिमें प्रणव और अन्तमें नमः लगाकर मन्त्राक्षरोंका न्यास करे। ऐसा दूसरे विद्वानोंका कथन है।

तत्पश्चात् बारह आदित्योंसहित द्वादश मूर्तियोंका न्यास करे। ये बारह मूर्तियाँ आदिमें द्वादशाक्षरके एक-एक मन्त्रसे युक्त होती हैं और इनके साथ बारह आदित्योंका संयोग होता है। यह अष्टाक्षर-मन्त्र अष्टप्रकृतिरूप बताया गया है। इनके साथ चार^१ आत्माका योग होनेसे द्वादशाक्षर होता है। ललाट, कुक्षि, हृदय, कण्ठ, दक्षिण पार्श्व, दक्षिण अंस, गल दक्षिणभाग, वाम पार्श्व, वाम अंस, गल वामभाग, पृष्ठभाग तथा ककुद्—इन बारह अङ्गोंमें मन्त्रसाधक क्रमशः बारह मूर्तियोंका न्यास करे। केशवका धाताके साथ ललाटमें न्यास करके नारायणका अर्यमाके साथ कुक्षिमें, माधवका मित्रके साथ हृदयमें तथा गोविन्दका वरुणके साथ कण्ठकूपमें न्यास करे। विष्णुका अंशुके साथ, मधुसूदनका भगके साथ, त्रिविक्रमका विवस्वान्‌के साथ, वामनका इन्द्रके साथ, श्रीधरका पूषाके साथ और हृषीकेशका पर्जन्यके साथ न्यास करे। पद्मनाभका त्वष्टाके साथ तथा दामोदरका विष्णुके साथ न्यास करे^२। तत्पश्चात् द्वादशाक्षर-मन्त्रका सम्पूर्ण सिरमें न्यास करे। इसके बाद विद्वान् पुरुष किरीट मन्त्रके द्वारा व्यापकन्यास करे। किरीट मन्त्र प्रणवके अतिरिक्त पैंसठ अक्षरका बताया गया है—‘ॐ किरीटकेयूरहारमकरकुण्डलशङ्खचक्रगदाम्भोजहस्तपीताम्बरधरश्रीवत्साङ्कितवक्षःस्थलश्रीभूमिसहितस्वात्मज्योतिर्र्मयदीमकराय सहस्रादित्यतेजसे नमः।’ इस प्रकार न्यासविधि करके सर्वव्यापी भगवान् नारायणका ध्यान करे।

उद्यत्कोट्यर्कसदृशं शङ्खं चक्रं गदाम्बुजम्।
दधतं च करैर्भूमिश्रीभ्यां पार्श्वद्वयाश्रितम्॥
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम्।
हारकेयूरवलयाङ्गदं पीताम्बरं स्मरेत्॥
(ना० पूर्व० तृ० ७०। ३२-३३)

जिनकी दिव्य कान्ति उदय-कालके कोटि-कोटि सूर्योंके सदृश है, जो अपने चार भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा और कमल धारण करते हैं, भूदेवी तथा श्रीदेवी जिनके उभय पार्श्वकी शोभा बढ़ा रही हैं, जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो अपने गलेमें चमकीली कौस्तुभमणि धारण करते हैं और हार, केयूर, वलय तथा अंगद आदि दिव्य आभूषण जिनके श्रीअङ्गोंमें


१. आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा तथा ज्ञानात्मा—ये चार आत्मा हैं।
२. यह मूर्तिपञ्जर-न्यास कहलाता है। इसका प्रयोग इस प्रकार है—
ललाटे—ॐ अम् केशवाय धात्रे नमः।
कुक्षौ—ॐ नम् आम् नारायणाय अर्यम्णे नमः।
हृदि—ॐ मोम् इम् माधवाय मित्राय नमः।
कण्ठकूपे—ॐ भम् ईम् गोविन्दाय वरुणाय नमः।
दक्षिणपार्श्वे—ॐ गम् उम् विष्णवे अंशवे नमः।
दक्षिणांसे—ॐ वम् ऊम् मधुसूदनाय भगाय नमः।
गलदक्षिणभागे—ॐ तेम् एम् त्रिविक्रमाय विवस्वते नमः।
वामपार्श्वे—ॐ वाम् ऐम् वामनाय इन्द्राय नमः।
वामांसे—ॐ सुम् ओम् श्रीधराय पूष्णे नमः।
गलवामभागे—ॐ देम् औम् हृषीकेशाय पर्जन्याय नमः।
पृष्ठे—ॐ वाम् अम् पद्मनाभाय त्वष्ट्रे नमः।
ककुदि—ॐ यम् अः दामोदराय विष्णवे नमः।