संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 478, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७६ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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हृदयमें सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाले इष्टदेवका इस प्रकार ध्यान करे—
उत्फुल्लकुसुमव्रातप्रशाखैर्वरद्रुमैः ।
सस्मेरमञ्जरीवृन्दबल्लरीवेष्टितैः शुभैः ॥
गलत्परागधूलीभिः सुरभीकृतदिङ्मुखैः ।
स्मरेच्छिशिरितं वृन्दावनं मन्त्री समाहितः ॥
उन्मीलन्नवकञ्जालि विगलन्मधुसञ्चयैः ।
लुब्धान्तःकरणैर्गूञ्जद्द्विरेफपटलैः शुभम् ॥
मरालपरभृत्कीरकपोतनिकरैर्मुहुः ।
मुखरीकृतमानृत्यन्मयूरकुलमञ्जुलम् ॥
कालिन्द्या लोलकल्लोलविप्रुषैर्मन्दवाहिभिः ।
उत्तनिद्राम्बुरुहव्रातरजोभिर्धूसरैः शिवैः ॥
प्रदीपतस्मेरैर्गोष्ठसुन्दरीमृदुवाससाम् ।
विलोलनपरैः संसेवितं वा तैर्निरन्तरम् ॥
स्मरेत्तदन्ते गीर्वाणभूरुहं सुमनोहरम् ।
तदधः स्वर्णवेद्यां च रत्नपीठमनुत्तमम् ॥
रत्नकुट्टिमपीठेऽस्मिन्नरुणं कमलं स्मरेत् ।
अष्टपत्रं च तन्मध्ये मुकुन्दं संस्मरेत्स्थितम् ॥
फुल्लेन्दीवरकान्तं च केकिबर्हावतंसकम् ।
पीतांशुकं चन्द्रमुखं सरसीरुहनेत्रकम् ॥
कौस्तुभोद्भासिताङ्गं च श्रीवत्साङ्कं सुभूषितम् ।
व्रजस्त्रीनेत्रकमलाभ्यर्चितं गोगणावृतम् ॥
गोपवृन्दयुतं वंशीं वादयन्तं स्मरेत्सुधीः । (४०-५०)
'मन्त्रोपासक एकाग्रचित्त होकर श्रीवृन्दावनका चिन्तन करे, जो शुभ एवं सुन्दर हरे-भरे वृक्षोंसे परिपूर्ण तथा शीतल है। उन वृक्षोंकी शाखाएँ खिले हुए कुसुम-समूहोंके भारसे झुकी हुई हैं। उनपर प्रफुल्ल मञ्जरियोंसे युक्त विकसित लतावल्लरियाँ फैली हुई हैं। वे वृक्ष झड़ते हुए पुष्पपरागरूप धूलिकणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको सुवासित करते रहते हैं, वहाँ खिलते हुए नूतन कमल-वनोंसे निकलती मधुधाराओंके संचयसे लुभाये अन्तःकरणवाले भ्रमरोंका समुदाय मनोहर गुञ्जार करता रहता है। हंस, कोकिल, शुक और पारावत आदि पक्षियोंका समूह बारम्बार कलरव करते हुए वृन्दावनको कोलाहलपूर्ण किये रहता है। चारों ओर नृत्य करते मोरोंके झुंडसे वह वन अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है। कालिन्दीकी चञ्चल लहरोंसे नीर-विन्दुओंको लेकर मन्द-मन्द गतिसे प्रवाहित होनेवाली शीतल सुखद वायु प्रफुल्ल पङ्कजोंके पराग-पुञ्जसे धूसर हो रही है। व्रजसुन्दरियोंके मृदुल वसनाञ्चलोंको वह चञ्चल किये देती है और इस प्रकार मनमें प्रेमोन्मादका उद्दीपन करती हुई वह मन्द वायु वृन्दावनका निरन्तर सेवन करती रहती है। उस वनके भीतर एक अत्यन्त मनोहर कल्पवृक्षका चिन्तन करे, जिसके नीचे सुवर्णमयी वेदीपर परम उत्तम रत्नमय पीठ शोभा पाता है। वहाँकी प्राङ्गण-भूमि भी रत्नोंसे आबद्ध है। उस रत्नमय पीठपर लाल रंगके अष्टदलकमलकी भावना करे, जिसके मध्यभागमें श्रीमुकुन्द विराजमान हैं। उनके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करे—उनकी अङ्ग-कान्ति विकसित नील कमलके समान श्याम है। वे मोर-पङ्खका मुकुट पहने हुए हैं, कटिभागमें पीताम्बर शोभा पा रहा है। उनका मुख चन्द्रमाको लज्जित कर रहा है, नेत्र खिले हुए कमलोंकी शोभा छीने लेते हैं, उनका सम्पूर्ण अङ्ग कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हो रहा है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित है। वे परम सुन्दर दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं, व्रजसुन्दरियाँ मानो अपने नेत्रकमलोंके उपहारसे उनकी पूजा करती हैं, गौएँ उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी हैं। गोपवृन्द उनके साथ हैं और वे वंशी बजा रहे हैं। विद्वान् पुरुष भगवान्का चिन्तन करे।'
बुद्धिमान् साधक इस तरह ध्यान करके पहले बीस हजार मन्त्र-जप करे। फिर एकाग्रचित्त हो अरुण कमल-कुसुमोंकी दशांश आहुति दे। तत्पश्चात् समाहित होकर मन्त्र-सिद्धिके लिये पाँच लाख जप करे। लाल कमलोंकी आहुति देकर साधक