भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 486

४८४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

वन्दे वेद्यं मुनीन्द्रैः कणिकमणिलसद्दिव्यभूषाभिरामं
दिव्याङ्गालेपभासं सकलभयहरं पीतवस्त्रं मुरारिम्॥
(ना० पूर्व० ८०। १५०)

'जो कुन्द और चन्द्रमाके समान सुन्दर गौरवर्णके हैं, जिनके नेत्र कमलकी शोभाको लज्जित कर रहे हैं, जो अपने करारविन्दोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं, नूतन कमलोंकी सुन्दर मालासे सुशोभित हैं, छोटी-छोटी मणियोंसे जटित सुन्दर दिव्य आभूषण जिनके अनुपम सौन्दर्य-माधुर्यको और बढ़ा रहे हैं तथा जिनके श्रीअङ्गोंमें दिव्य अङ्गराग शोभा पा रहा है, उन मुनीन्द्रवेद्य, सकल भयहारी, पीताम्बरधारी मुरारिकी मैं वन्दना करता हूँ।'

इस प्रकार ध्यान करके आदिपुरुष श्रीकृष्णको अपने विकसित हृदयकमलके आसनपर विराजमान देखे और यह भावना करे कि वे घनीभूत मेघोंकी श्याम घटा तथा अद्भुत सुवर्णकी-सी नील एवं पीत प्रभा धारण करते हैं। इस चिन्तनके साथ साधक बारह लाख मन्त्रका जप करे। दो प्रकारके मन्त्रोंमेंसे एकका, जो प्रणवसम्पुटित है, जप करना चाहिये। फिर दूधवाले वृक्षोंकी समिधाओंसे बारह हजार आहुति दे अथवा मधु-घृत एवं मिश्रीमिश्रित खीरसे होम करे। इस प्रकार मन्त्रोपासक अपने हृदयकमलमें लोकेश्वरोंके भी आराध्यदेव भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए प्रतिदिन तीन हजार मन्त्रका जप करे। फिर सायंकालके लिये बतायी हुई विधिसे भलीभाँति पूजा करके साधक भगवत्-चिन्तनमें संलग्न हो पुनः पूर्वोक्त रीतिसे हवन करे। जो विद्वान् इस तरह गोपालनन्दन श्रीकृष्णका नित्य भजन करता है, वह भवसागरसे पार हो परमपदको प्राप्त होता है।

पहले दो त्रिभुज अङ्कित करे; जिसमें एक ऊर्ध्वमुख और दूसरा अधोमुख हो। एकके ऊपर दूसरा त्रिकोण होना चाहिये। इस प्रकार छः कोण हो जायँगे। कोण बाह्य भागमें होंगे। उनके बीचमें जो षट्कोण चक्र होगा, उसे अग्निपुर कहते हैं। उस अग्निपुरकी कर्णिका (मध्यभाग)-में 'क्लीं' यह बीजमन्त्र अङ्कित करे। उसके साथ साध्य पुरुष एवं कार्यका भी उल्लेख करे। बहिर्गत कोणोंके विवरमें षडक्षर-मन्त्र लिखे। छः कोणोंके ऊपर एक गोलाकार रेखा खींचकर उसके बाह्यभागमें दस-दल कमल अङ्कित करे। उन दस दलोंके केसरोंमें एक-एकमें दो-दो अक्षरके क्रमसे 'ह्रीं' और 'श्रीं' पूर्वक अष्टादशाक्षर-मन्त्रके अक्षरोंका उल्लेख करे। तदनन्तर दलोंके मध्यभागमें दशाक्षर-मन्त्रके एक-एक अक्षरोंको लिखे। इस प्रकार लिखे हुए दस-दल चक्रको भूपुरसे (चौकोर रेखासे) आवृत करे। भूपुरमें अस्त्रोंके स्थानमें कामबीज (क्लीं)- का उल्लेख करे। इस यन्त्रको सोनेके पत्रपर सोनेकी ही शलाकासे गोरोचनद्वारा लिखकर उसकी गुटिका बना ले। यही गोपाल-यन्त्र है। यह सम्पूर्ण