संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 499, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४९७ ---|---
श्रीवृन्दावनकी गलियोंमें झुकी और फूली हुई लतावेलोंकी पङ्क्तियाँ फैली हुई हैं। उनके
भीतर घुसकर लोट-पोट करनेसे शीतल-मन्द वायु सुगन्धसे भर गयी है। वह सुगन्धित वायु उस यमुना-पुलिनको सब ओरसे सुवासित कर रही है, जहाँ श्रीराधारानीके एकमात्र जीवनधन नागर नन्दकिशोर विचरण कर रहे हैं। उनका मुख चन्द्रमासे भी अधिक मनोहर है और उनकी अङ्गकान्ति स्निग्ध मेघोंकी श्याम मनोहर छविको छीने लेती है। मैं उन्हीं नटवर नन्दकिशोरकी वन्दना करता हूँ।
मुनीश्वर! इन मन्त्रोंकी पूजा पूर्वोक्त पद्धतिसे ही होती है, यह जानना चाहिये।
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥*
(ना० पूर्व० ८१। ९७-९८)
यह बत्तीस अक्षरोंका मन्त्र है। इसके नारद ऋषि, गायत्री और अनुष्टुप् छन्द तथा पुत्रप्रदाता श्रीकृष्ण देवता हैं। चारों पादों तथा सम्पूर्ण मन्त्रसे इसका अङ्ग-न्यास करे।
ध्यान
विजयेन युतो रथस्थितः प्रसमानीय समुद्रमध्यतः।
प्रददत्तनयान् द्विजन्मने स्मरणीयो वसुदेवनन्दनः॥
(ना० पूर्व० ८१। १००)
'जो अर्जुनके साथ रथपर बैठे हैं और क्षीरसागरसे लाकर ब्राह्मणके मरे पुत्रको उन्हें वापस दे रहे हैं, उन वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका चिन्तन करना चाहिये।'
इसका एक लाख जप और घी, चीनी तथा मधु-मेवा आदि मधुर पदार्थोंमें सने हुए तिलोंसे दस हजार होम करे। पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर अङ्ग, दिक्पाल तथा आयुधोंसहित श्रीकृष्णकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेनेपर वन्ध्या स्त्रीके भी पुत्र उत्पन्न हो सकता है। 'ॐ ह्रीं हंसः सोऽहं स्वाहा' यह दूसरा अष्टाक्षर-मन्त्र है। इस पञ्चब्रह्मात्मक मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि, परमा गायत्री छन्द तथा परम ज्योतिःस्वरूप परब्रह्म देवता कहे गये हैं। प्रणव बीज है और स्वाहा शक्ति कही गयी है। 'स्वाहा' हृदयाय नमः। सोऽहं शिरसे स्वाहा। हंसः शिखायै वषट्। हृल्लेखा कवचाय हुम्। ॐ नेत्राभ्यां वौषट्। 'हरिहर' अस्त्राय फट्। इस प्रकार अङ्ग-न्यास करे।
स ब्रह्मा स शिवो विप्र स हरिः सैव देवराट्।
स सर्वरूपः सर्वाख्यः सोऽक्षरः परमः स्वराट्॥
(ना० पूर्व० ८१। १०७)
'विप्रवर! वे श्रीकृष्ण ही ब्रह्मा हैं, वे ही
* 'देवकीपुत्र! गोविन्द! वासुदेव! जगदीश्वर! श्रीकृष्ण! मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ, मुझे पुत्र प्रदान करो।'