भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 522

५२० * संक्षिप्त नारदपुराण *

९६०. प्रकृतिः=श्रीकृष्णकी स्वरूपभूता ह्लादिनी शक्ति, ९६१. परमानन्दा=परमानन्दस्वरूपा, ९६२. नीपद्रुमतलस्थिता=कदम्बवृक्षके नीचे खड़ी होनेवाली, ९६३. कृपाकटाक्षा=कृपापूर्ण कटाक्षवाली, ९६४. विम्बोष्ठी=विम्बफलके समान लाल ओठवाली, ९६५. रम्भा=सर्वाधिक सुन्दरी होनेके कारण रम्भा नामसे प्रसिद्ध, ९६६. चारुनितम्बिनी=मनोहर नितम्बवाली।

९६७. स्मरकेलिनिधाना=प्रेमलीलाकी निधि, ९६८. गण्डताटङ्कमण्डिता=कपोलोंपर कर्णभूषणोंसे अलंकृत, ९६९. हेमाद्रिकान्तिरुचिरा=सुवर्णगिरि मेरुकी कान्तिके समान सुनहरी कान्तिसे सुशोभित परम सुन्दरी, ९७०. प्रेमाढ्या=प्रेमसे परिपूर्ण, ९७१. मदमन्थरा=प्रेममदसे मन्द गतिवाली।

९७२. कृष्णचिन्ता=श्रीकृष्णका चिन्तन करनेवाली, ९७३. प्रेमचिन्ता=श्रीकृष्ण-प्रेमका चिन्तन करनेवाली, ९७४. रतिचिन्ता=श्रीकृष्णरतिका चिन्तन करनेवाली, ९७५. कृष्णदा=श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाली, ९७६. रासचिन्ता=श्रीकृष्णके साथ रासका चिन्तन करनेवाली, ९७७. भावचिन्ता=प्रेम-भावका चिन्तन करनेवाली, ९७८. शुद्धचिन्ता=विशुद्ध चिन्तनवाली, ९७९. महारसा=अतिशय प्रेमस्वरूपा।

९८०. कृष्णदृष्टित्रुटियुगा=श्रीकृष्णको देखे बिना क्षणभरके विलम्बको भी एक युगके समान माननेवाली, ९८१. दृष्टिपक्ष्मविनिन्दिनी=श्रीकृष्णका दर्शन करते समय बाधा देनेवाली आँखकी पलकोंकी निन्दा करनेवाली, ९८२. कन्दर्पजननी=कामदेवको जन्म देनेवाली, ९८३. मुख्या=सर्वप्रधाना, ९८४. वैकुण्ठगतिदायिनी=वैकुण्ठ धामकी प्राप्ति करानेवाली।

९८५. रासभावा=रासमण्डलमें आविर्भूत होनेवाली, ९८६. प्रियाश्लिष्टा=प्रियतम श्यामसुन्दरके द्वारा आश्लिष्ट, ९८७. प्रेष्ठा=श्रीकृष्णकी प्रेयसी, ९८८. प्रथमनायिका=श्रीकृष्णकी प्रधान नायिका, ९८९. शुद्धा=शुद्धस्वरूपा, ९९०. सुधादेहिनी=प्रेमामृतमय शरीरवाली, ९९१. श्रीरामा=लक्ष्मीके समान सुन्दर, ९९२. रसमञ्जरी=श्रीकृष्णप्रेम-रसको प्रकट करनेके लिये मञ्जरीके समान।

९९३ .सुप्रभावा=उत्तम प्रभावसे युक्त, ९९४. शुभाचारा=शुभ आचरणवाली, ९९५. स्वर्णदीनर्मदाम्बिका=गङ्गा तथा नर्मदाकी जननी, ९९६. गोमतीचन्द्रभागेडया=गोमती और चन्द्रभागाके द्वारा स्तवनीय, ९९७. सरयूताम्रपर्णीसूः=सरयू तथा ताम्रपर्णी नदीको प्रकट करनेवाली।

९९८. निष्कलङ्कचरित्रा=कलङ्कशून्य चरित्रवाली, ९९९. निर्गुणा=गुणातीत, १०००. निरञ्जना=निर्मलस्वरूपा। नारद! यह राधाकृष्णयुगलरूप भगवान्‌का सहस्रनाम स्तोत्र है।

इसका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये। यह वृन्दावनके रसकी प्राप्ति करानेवाला है। बड़े-से-बड़े पापोंको शान्त कर देता है। अभिलषित भोगोंको देनेवाला महान् साधन है। यह राधा-माधवकी भक्ति देनेवाला है। जिनकी मेधाशक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती तथा जो श्रीराधा-प्रेमरूपी सुधासिन्धुमें नित्य विहार—सतत अवगाहन करते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। श्रीराधादेवी संसारकी सृष्टि करती हैं। वे ही जगत्‌के पालनमें तत्पर रहती हैं और वे ही अन्तकालमें जगत्‌का संहार करनेवाली हैं। वे सबकी अधीश्वरी तथा सबकी जननी हैं। मुनीश्वर! यह उन्हीं श्रीराधाकृष्णका सहस्रनाम मैंने तुम्हें बताया है। यह दिव्य सहस्रनाम भोग और मोक्ष देनेवाला है। (नारदपुराण पूर्वभाग अध्याय ८२)

॥ तृतीय पाद सम्पूर्ण ॥