संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें५३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
'ब्रह्मखण्ड' बताया गया है।
इसके बाद चौथा परम उत्तम 'काशीखण्ड' है, जिसमें विन्ध्यपर्वत और नारदजीके संवादका वर्णन है। फिर सत्यलोकका प्रभाव, अगस्त्यके आश्रममें देवताओंका आगमन, पतिव्रताच्ररित्र तथा तीर्थयात्राकी प्रशंसा है। तदनन्तर सप्तपुरीका वर्णन, संयमिनीका निरूपण, शिवशर्माको सूर्य, इन्द्र और अग्निके लोककी प्राप्तिका उल्लेख है। अग्निका प्रादुर्भाव, निर्ऋति तथा वरुणकी उत्पत्ति, गन्धवती, अलकापुरी और ईशानपुरीके उद्भवका वर्णन, चन्द्र, सूर्य, बुध, मङ्गल तथा बृहस्पतिके लोक, ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, ध्रुवलोक और तपोलोकका वर्णन है। तत्पश्चात् ध्रुवलोककी पुण्यमयी कथा, सत्यलोकका निरीक्षण, स्कन्द-अगस्त्य-संवाद, मणिकर्णिकाकी उत्पत्ति, गङ्गाजीका प्राकट्य, गङ्गासहस्रनाम, काशीपुरीकी प्रशंसा, भैरवका आविर्भाव, दण्डपाणि तथा ज्ञानवापीका उद्भव, कलावतीकी कथा, सदाचारनिरूपण, ब्रह्मचारीका आख्यान, स्त्रीके लक्षण, कर्तव्याकर्तव्यका निर्देश, अविमुक्तेश्वरका वर्णन, गृहस्थ योगीके धर्म, कालज्ञान, दिवोदासकी पुण्यमयी कथा, काशीका वर्णन, भूतलपर मायागणपतिका प्रादुर्भाव, विष्णुमायाका प्रपञ्च, दिवोदासका मोक्ष, पञ्चनदतीर्थकी उत्पत्ति, बिन्दुमाधवका प्राकट्य, तदनन्तर काशीका वैष्णवतीर्थ कहलाना; फिर शूलधारी शङ्करका काशीमें आगमन, जैगीषव्यके साथ संवाद, महेश्वरका ज्येष्ठेश्वर नाम होना, क्षेत्राख्यान, कन्दुकेश्वर और व्याघ्रेश्वरका प्रादुर्भाव, शैलेश्वर, रत्नेश्वर तथा कृत्तिवासेश्वरका प्राकट्य, देवताओंका अधिष्ठान, दुर्गासुरका पराक्रम, दुर्गाजीकी विजय, ॐकारेश्वरका वर्णन, पुनः ॐकारका माहात्म्य, त्रिलोचनका प्रादुर्भाव, केदारेश्वरका आख्यान, धर्मेश्वरकी कथा, विष्णुभुजाका प्राकट्य, वीरेश्वरका आख्यान, गङ्गा-माहात्म्यकीर्तन, विश्वकर्मेश्वरकी महिमा, दक्षयज्ञोद्भव, सतीश और अमृतेश आदिका माहात्म्य, पराशरनन्दन व्यासजीकी भुजाओंका स्तम्भन, क्षेत्रके तीर्थोंका समुदाय, मुक्तिमण्डपकी कथा, विश्वनाथजीका वैभव, तदनन्तर काशीकी यात्रा और परिक्रमाका वर्णन—ये 'काशीखण्ड'के विषय हैं।
तदनन्तर पाँचवें 'अवन्तीखण्ड'का वर्णन सुनो। इसमें महाकालवनका आख्यान, ब्रह्माजीके मस्तकका छेदन, प्रायश्चित्तविधि, अग्निकी उत्पत्ति, देवताओंका आगमन, देवदीक्षा, नाना प्रकारके पातकोंका नाश करनेवाला शिवस्तोत्र, कपालमोचनकी कथा, महाकालवनकी स्थिति, कलकलेश्वरका सर्वपापनाशक तीर्थ, अप्सराकुण्ड, पुण्यदायक रुद्रसरोवर, कुटुम्बेश, विद्याधरेश्वर तथा मर्कटेश्वर तीर्थका वर्णन है। तत्पश्चात् स्वर्गद्वार, चतुःसिन्धुतीर्थ, शङ्करवापिका, शङ्करादित्य, पापनाशक गन्धवतीतीर्थ, दशाश्वमेधिकतीर्थ, अनशंतीर्थ, हरिसिद्धिप्रदतीर्थ, पिशाचादियात्रा, हनुमदीश्वर, कवचेश्वर, महाकालेश्वरयात्रा, वल्मीकेश्वरतीर्थ, शुक्रेश्वर और नक्षत्रेश्वरतीर्थका उपाख्यान, कुशस्थलीकी परिक्रमा, अक्रूरतीर्थ, एकपादतीर्थ, चन्द्रार्कवैभवतीर्थ, करभेशतीर्थ, लड्डुकेश आदि तीर्थ, मार्कण्डेश्वरतीर्थ, यज्ञवापीतीर्थ, सोमेश्वरतीर्थ, नरकान्तकतीर्थ, केदारेश्वर, रामेश्वर, सौभाग्येश्वर तथा नरादित्यतीर्थ, केशवादित्य, शक्तिभेदतीर्थ, स्वर्णसारमुखतीर्थ, ॐकारेश्वर आदि तीर्थ, अन्धकासुरके द्वारा स्तुति-कीर्तन, कालवनमें शिवलिङ्गोंकी संख्या तथा स्वर्णशृङ्गेश्वरतीर्थका वर्णन है। फिर कुशस्थली, अवन्ती एवं उज्जयिनीपुरीके पद्मावती, कुमुद्वती, अमरावती, विशाला तथा प्रतिकल्प—इन नामोंका उल्लेख है। इनका उच्चारण ज्वरकी शान्ति करनेवाला है। तत्पश्चात् शिप्रामें स्नान आदिका फल, नागोंद्वारा की हुई भगवान् शिवकी स्तुति, हिरण्याक्षवधकी कथा, सुन्दरकुण्डकतीर्थ, नीलगङ्गा, पुष्करतीर्थ, विन्ध्यवासनतीर्थ, पुरुषोत्तमतीर्थ, अघनाशनतीर्थ, गोमतीतीर्थ, वामनकुण्ड, विष्णुसहस्रनाम, वीरेश्वर सरोवर, कालभैरवतीर्थ, नागपञ्चमीकी महिमा,