संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 543, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें| * पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५४१ |
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उत्तम गतिदायक केदारेश्वर, भीमेश्वर, भैरवेश्वर, चण्डीश्वर, भास्करेश्वर, चन्द्रेश्वर, मङ्गलेश्वर, बुधेश्वर, बृहस्पतीश्वर, शुक्रेश्वर, शनैश्चरेश्वर, राहीश्वर, केत्वीश्वर आदि शिवविग्रहोंका वर्णन है। तत्पश्चात् सिद्धेश्वर आदि अन्य पाँच रुद्रोंकी स्थितिका वर्णन किया गया है। वरारोहा, अजापाला, मङ्गला, ललितेश्वरी, लक्ष्मीश्वर, बाडवेश्वर, उर्वीश्वर, कामेश्वर, गौरीश्वर, वरुणेश्वर, दुर्वासेश्वर, गणेश्वर, कुमारेश्वर, चण्डकल्प, शकुलीश्वर, कोटीश्वर तथा बालरूपधारी ब्रह्मा आदिकी उत्तम कथा है। तत्पश्चात् नरकेश्वर, संवर्तेश्वर, निधीश्वर, बलभद्रेश्वर, गङ्गा, गणपति, जाम्बवती नदी, पाण्डुकूप, शतमेध, लक्षमेध और कोटिमेधकी श्रेष्ठ कथा है। दुर्वासादित्य, घटस्थान, हिरण्यासङ्गम, नागरादित्य, श्रीकृष्ण, संकर्षण, समुद्र, कुमारी, क्षेत्रपाल, ब्रह्मेश्वर, पिङ्गलासङ्गेश्वर, शङ्करादित्य, घटेश्वर, ऋषितीर्थ, नन्दादित्य, त्रितकूप, सोमपान, पर्णादित्य और न्युङ्कुमतीकी भी अद्भुत कथाका उल्लेख है। तदनन्तर बाराहस्वामीका वृत्तान्त, छायालिङ्ग, गुल्फ, कनकनन्दा, कुन्ती और गङ्गेेशकी कथा है। फिर चमसोद्भेदेश्वर, विदुरेश्वर, त्रिलोकेश्वर, मङ्कणेश्वर, त्रैपुरेश्वर तथा षण्डतीर्थकी कथा है। फिर सूर्यप्राची, त्रीक्षण और उमानाथकी कथा है। पृथिव्युद्धार, शूलस्थल, च्यवनादित्य और च्यवनेश्वरका वृत्तान्त है। उसके बाद अजापालेश्वर, बालादित्य, कुबेरस्थल तथा ऋषितोयाकी पुण्यमयी कथा एवं शृगालेश्वरका माहात्म्यकीर्तन है। फिर नारदादित्यकी कथा, नारायणके स्वरूपका निरूपण, तप्तकुण्डकी महिमा तथा मूलचण्डीश्वरका वर्णन है। चतुर्मुख गणेश और कलम्बेश्वरकी कथा, गोपालस्वामी, बकुलस्वामी और मरुद्रणकी भी कथा है। तत्पश्चात् क्षेमादित्य, उन्नतविघ्नेश, तलस्वामी, कालमेध, रुक्मिणी, दुर्वासेश्वर, भद्रेश्वर, शङ्खावर्त, मोक्षतीर्थ, गोष्पदतीर्थ, अच्युतगृह, जालेश्वर, ॐकारेश्वर, चण्डीश्वर, आशापुरनिवासी विघ्नेश और कलाकुण्डकी अद्भुत कथा है। कपिलेश्वर और जरद्गव शिवकी भी विचित्र कथाका उल्लेख है। नलेश्वर, कर्कोटकेश्वर, हाटकेश्वर, नारदेश्वर, यन्त्रभूषा, दुर्गकूट और गणेशकी कथाका भी उल्लेख है। सुपर्णभैरवी और एलाभैरवी तथा भल्लतीर्थकी भी महिमा है। तत्पश्चात् कर्दमालतार्थ और गुप्त सोमनाथका वर्णन है। इसके बाद बहुस्वर्णेश्वर, भृङ्गेश्वर, कोटीश्वर, मार्कण्डेश्वर, कोटीश तथा दामोदरगृहकी माहात्म्य-कथा है। तदनन्तर स्वर्णरेखा, ब्रह्मकुण्ड, कुन्तीश्वर, भीमेश्वर, मृगीकुण्ड तथा सर्वस्व—ये वस्त्रापथक्षेत्रमें कहे गये हैं। तत्पश्चात् दुर्गाभल्लेश, गङ्गेश, रैवतेश, अर्बुदेश्वर, अचलेश्वर, नागतीर्थ, वसिष्ठाश्रम, भद्रकर्ण, त्रिनेत्र, केदार, तीर्थगमन, कोटीश्वर, रूपतीर्थ और हृषीकेश—ये अद्भुत माहात्म्यकथाएँ हैं। इसके बाद सिद्धेश्वर, शुक्रेश्वर, मणिकर्णीश्वर, पङ्कतीर्थ, यमतीर्थ और वाराहीतीर्थ आदिके माहात्म्यका वर्णन है। फिर चन्द्रप्रभास, पिण्डोदक, श्रीमाता, शुक्लतीर्थ, कात्यायनीदेवी, पिण्डारकतीर्थ, कनकखलतीर्थ, चक्रतीर्थ, मानुषतीर्थ, कपिलाग्रीतीर्थ तथा रक्तानुबन्ध आदि माहात्म्यकथाका उल्लेख है। तदनन्तर गणेशतीर्थ, पार्थेश्वरतीर्थ और उज्ज्वलतीर्थकी यात्रामें चण्डीस्थान, नागोद्भव, शिवकुण्ड, महेशतीर्थ तथा कामेश्वरका माहात्म्यवर्णन और मार्कण्डेयजीकी उत्पत्तिकथा है। फिर उद्दालकेश और सिद्धेशके समीपवर्ती तीर्थोंकी पृथक्-पृथक् कथाएँ हैं। इसके बाद श्रीदेवमाताकी उत्पत्ति, व्यास और गौतमतीर्थकी कथा, कुलसन्तार्तीर्थका माहात्म्य तथा रामतीर्थ एवं कोटितीर्थकी महिमा है। चन्द्रोद्भेदतीर्थ, ईशानतीर्थ और ब्रह्मस्थानकी उत्पत्तिका अद्भुत माहात्म्य तथा त्रिपुष्कर, रुद्रह्रद और गुहेश्वरकी शुभ कथा है। तत्पश्चात् अविमुक्तकी महिमा, उमामहेश्वरका माहात्म्य, महौजका प्रभाव और जम्बूतीर्थका महत्त्व कहा गया है। गङ्गाधर और मिश्रककी कथा एवं फलस्तुतिका भी वर्णन है। तदनन्तर द्वारकामाहात्म्यके प्रसङ्गमें चन्द्रशर्माकी