भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 770 में से

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पृष्ठ 550

५४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

फिर जातूकर्ण्यसे वायुदेवके मुखसे प्रकट हुए इस उत्तम पुराणको पाकर व्यासदेवने इसे प्रमाणभूत माना और इस लोकमें इसका प्रचार किया। वत्स! जो एकाग्रचित्त हो इस पुराणका पाठ एवं श्रवण करता है, वह इस लोकमें सारे पापोंका नाश करके अनामय लोक (रोग-शोकसे रहित परम धाम)-में जाता है। जो इस पुराणको लिखकर सोनेके सिंहासनपर रखता और वस्त्रसे आच्छादित करके ब्राह्मणको दान कर देता है, वह ब्रह्माजीके लोकमें जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मरीचे! मैंने तुमसे जो ये अठारह पुराण संक्षेपसे कहे हैं, उन सबको विस्तारसे सुनना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव इन अठारह पुराणोंको विधिपूर्वक सुनता अथवा कहता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। मैंने इस समय जो कुछ कहा है, यह पुराणोंका सूत्ररूप है। पुराणका फल चाहनेवाले पुरुषको इसका नित्य अनुशीलन करना चाहिये। जो दाम्भिक, पापाचारी, देवता और गुरुकी निन्दा करनेवाला, साधुमहात्माओंसे द्वेष रखनेवाला और शठ है, उसे इस पुराणका उपदेश कदापि नहीं देना चाहिये। जो शान्त, मनोनिग्रहसे युक्त, सेवापरायण, द्वेषरहित तथा पवित्र हो, उस श्रेष्ठ वैष्णव पुरुषको ही इसका उपदेश देना चाहिये।

बारह मासोंकी प्रतिपदाके व्रत एवं आवश्यक कृत्योंका वर्णन

श्रीनारदजी बोले— प्रभो! मैंने आपके मुखसे समस्त पुराणोंका सूत्र, जैसा कि परमेष्ठी ब्रह्माजीने महर्षि मरीचिसे कहा था, सुन लिया। महाभाग! अब मुझसे क्रमशः तिथियोंके विषयमें निरूपण कीजिये, जिससे व्रतका ठीक-ठीक निश्चय हो जाय। जिस मासमें, जिस पुण्य तिथिको जिसने उपासना की है और उसकी पूजा आदिका जो विधान है, वह सब इस समय बताइये।

श्रीसनातनजीने कहा— नारद! सुनो, अब मैं तुमसे तिथियोंके पृथक्-पृथक् व्रतका वर्णन करता हूँ। तिथियोंके जो स्वामी हैं, उन्हींके क्रमसे पृथक्-पृथक् व्रत बताया जाता है, जो सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है। चैत्रमासके शुक्ल पक्षमें प्रथम दिन सूर्योदयकालमें ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की थी, इसलिये वर्ष और वसन्त-ऋतुके आदिमें बलिराज्य-सम्बन्धी तिथि-अमावास्याको जो प्रतिपदा तिथि प्राप्त होती है, उसीमें सदा विद्वानोंको व्रत करना चाहिये। प्रतिपदा तिथि पूर्वविद्धा होनेपर ही व्रत आदिमें ग्रहण करने योग्य है। उस दिन महाशान्ति करनी चाहिये। वह समस्त पापोंका नाश, सब प्रकारके उत्पातोंकी शान्ति तथा कलियुगके दुष्कर्मोंका निवारण करनेवाली होती है। साथ ही वह आयु देनेवाली, पुष्टिकारक तथा धन और सौभाग्यको बढ़ानेवाली है। वह परम मङ्गलमयी, शान्ति, पवित्र होनेके साथ ही इहलोक और परलोकमें भी सुख देनेवाली है। उस तिथिको पहले अग्निरूपधारी भगवान् ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये, फिर क्रमशः सब देवताओंकी पृथक्-पृथक् पूजा करे। इस तरह पूजा और ॐकारपूर्वक नमस्कार^१ करके कुश, जल, तिल और अक्षतके साथ सुवर्ण और वस्त्रसहित दक्षिणा लेकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको व्रतकी पूर्तिके लिये दान करना चाहिये। इस प्रकार पूजा-विशेषसे 'शौरि' नामक व्रत सम्पन्न होता है। ब्रह्मन्! यह मनुष्योंको आरोग्य^२ प्रदान करनेवाला है। मुने! उसी दिन


१. नामके आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'नमः' जोड़कर बोलना ही ॐकारपूर्वक नमस्कार है; यथा— 'ॐ ब्रह्मणे नमः' इत्यादि। अथवा 'ॐ नमः' को एक साथ भी बोल सकते हैं; यथा— 'ॐ नमो ब्रह्मणे' इत्यादि।
२. इसी तिथिको विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें 'आरोग्यव्रत' का विधान किया गया है और ब्रह्मपुराणमें 'संवत्सरारम्भ-

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