भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 564
५६२* संक्षिप्त नारदपुराण *

वैशाख शुक्ला सप्तमीको राजा जह्नुने स्वयं क्रोधवश गङ्गाजीको पी लिया था और पुनः अपने दाहिने कानके छिद्रसे उनका त्याग किया था। अतः वहाँ प्रातःकाल स्नान करके निर्मल जलमें गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि सम्पूर्ण उपचारोंद्वारा गङ्गाजीका पूजन करना चाहिये। तदनन्तर एक सहस्र घट दान करना चाहिये। 'गङ्गाव्रत'में यही कर्तव्य है। यह सब भक्तिपूर्वक किया जाय तो गङ्गाजी सात पीढ़ियोंको निःसंदेह स्वर्गमें पहुँचा देती हैं। इसी तिथिको 'कमलव्रत' भी बताया गया है। तिलसे भरे हुए पात्रमें सुवर्णमय सुन्दर कमल रखकर उसे दो वस्त्रोंसे ढँककर गन्ध, धूप आदिके द्वारा उसकी पूजा करे। तत्पश्चात्—

नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व० ११९। १५-१६)

'हाथमें कमल धारण करनेवाले भगवान् सूर्यको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाले भगवान् सविताको नमस्कार है। दिवाकर ! आपको नमस्कार है। प्रभाकर ! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार देवेश्वर सूर्यको नमस्कार करके सूर्यास्तके समय जलसे भरे हुए घड़ेके साथ वह कमल और एक कपिला गाय ब्राह्मणको दान दे। उस दिन अखण्ड उपवास और दूसरे दिन भोजन करना चाहिये। ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे भोजन करानेसे व्रत सफल होता है। उसी दिन 'निम्बसप्तमी'– का व्रत बताया जाता है। द्विजश्रेष्ठ नारद ! उसमें 'ॐ खखोल्काय नमः' इस मन्त्रद्वारा नीमके पत्तेसे भगवान् भास्करकी पूजाका विधान है। पूजनके पश्चात् नीमका पत्ता खाय और मौन होकर भूमिपर शयन करे। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। यह 'निम्बपत्रव्रत' है, जो इसका पालन करनेवाले पुरुषोंको सब प्रकारका सुख देनेवाला है। इसी दिन 'शर्करासप्तमी' भी कही गयी है। शर्करासप्तमी अश्वमेध यज्ञका फल देनेवाली, सब दुःखोंको शान्त करनेवाली और सन्तानपरम्पराको बढ़ानेवाली है। इसमें शक्करका दान करना, शक्कर खाना और खिलाना कर्तव्य है। यह व्रत भगवान् सूर्यको विशेष प्रिय है। जो परम भक्तिभावसे इसका पालन करता है, वह सद्गतिको प्राप्त होता है।

ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमीको साक्षात् भगवान् सूर्यस्वरूप इन्द्र उत्पन्न हुए हैं। ब्रह्मन् ! जो उपवासपूर्वक जितेन्द्रियभावसे विधि-विधानके साथ उनकी पूजा करता है, वह देवराज इन्द्रके प्रसादसे स्वर्गलोकमें स्थान पाता है। विप्रेन्द्र ! आषाढ़ शुक्ला सप्तमीको विवस्वान् नामक सूर्य प्रकट हुए थे; अतः उस तिथिमें गन्ध, पुष्प आदि पृथक्-पृथक् सामग्रियोंद्वारा उनकी भलीभाँति पूजा करके मनुष्य भगवान् सूर्यका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

श्रावण शुक्ला सप्तमीको 'अव्यङ्ग' नामक शुभ व्रत करना चाहिये। इसमें सूर्यदेवकी पूजाके अन्तमें उनकी प्रसन्नताके लिये कपासके सूतका बना हुआ साढ़े चार हाथका वस्त्र दान करना

संक्षिप्त नारद पुराण · पृष्ठ 564, कुल 770 में से · BharatKosha