भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 574

५७२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भक्त्या मामनुकम्पय॥
(ना० पूर्व० ११९। ६३)

'सहस्रों किरणोंसे सुशोभित तेजोराशि जगदीश्वर सूर्यदेव! आइये, भक्तिपूर्वक मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार कीजिये। साथ ही मुझे अपनी सहज कृपासे अपनाइये।'

इस मन्त्रसे अर्घ्य देकर चौदह ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा रजतमयी दक्षिणा दे। उन्हें विदा करके स्वयं भी भोजन करे। ब्रह्मन्! इस प्रकार विधिका पालन करके मनुष्य धर्मराजकी कृपासे इहलोकके धन, पुत्र आदि देवदुर्लभ भोगोंको भोगता है और देहावसान होनेपर श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकका भागी होता है।


द्वादश मासके एकादशी-व्रतोंकी विधि और महिमा तथा दशमी आदि तीन दिनोंके पालनीय विशेष नियम

सनातनजी कहते हैं—मुने! दोनों पक्षोंकी एकादशीको मनुष्य निराहार रहे और एकाग्रचित्त हो नाना प्रकारके पुष्पोंसे शुभ एवं विचित्र मण्डप बनावे। फिर शास्त्रोक्त विधिसे भलीभाँति स्नान करके उपवास और इन्द्रियसंयमपूर्वक श्रद्धा और एकाग्रताके साथ नाना प्रकारके उपचार जप, होम, प्रदक्षिणा, स्तोत्रपाठ, दण्डवत्-प्रणाम तथा मनको प्रिय लगनेवाले जय-जयकारके शब्दोंसे विधिवत् श्रीविष्णुकी पूजा करे तथा रात्रिमें जागरण करे। ऐसा करनेसे मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। चैत्र शुक्ला एकादशीको उपवास करके श्रेष्ठ मनुष्य तीन दिनके लिये आगे बताये जानेवाले सभी नियमोंका पालन करनेके पश्चात् द्वादशीको भक्तिपूर्वक सनातन वासुदेवकी षोडशोपचारसे पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे और उनको विदा करके स्वयं भी भोजन करे। यह 'कामदा' नामक एकादशी है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। यदि भक्तिपूर्वक इस तिथिको उपवास किया जाय तो यह भोग और मोक्ष देनेवाली होती है। वैशाख कृष्णा एकादशीको 'वरूथिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके दूसरे दिन भगवान् मधुसूदनकी पूजा करनी चाहिये। इसमें सुवर्ण, अन्न, कन्या और धेनुका दान उत्तम माना गया है। वरूथिनीका व्रत करके नियमपरायण मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है। वैशाख शुक्ला एकादशीको 'मोहिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके दूसरे दिन स्नानके पश्चात् गन्ध आदिसे भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणभोजन कराकर वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

ज्येष्ठ कृष्णा एकादशीको 'अपरा' कहते हैं। उस दिन नियमपूर्वक उपवास करके द्वादशीको प्रातः-काल नित्यकर्मसे निवृत्त हो भगवान् त्रिविक्रमकी विधिवत् पूजा करे। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। ऐसा करनेवाला मानव सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। ज्येष्ठ शुक्ला एकादशीको 'निर्जला' एकादशी कहते हैं। द्विजोत्तम! सूर्योदयसे लेकर सूर्योदयतक निर्जल उपवास करके दूसरे दिन द्वादशीके प्रातः-काल नित्यकर्म करनेके अनन्तर विविध उपचारोंसे भगवान् हृषीकेशका पूजन करे। तदनन्तर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य चौबीस एकादशियोंका फल प्राप्त कर लेता है। आषाढ़ कृष्ण एकादशीको 'योगिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको नित्यकर्मके पश्चात् भगवान् नारायणकी पूजा करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे।