भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 578

५७६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

बर्तन, मांस, मसूर, चना, कोदो, शाक, मधु, पराया अन्न, पुनर्भाजन (दो बार भोजन) और मैथुन—दशमीके दिन इन दस वस्तुओंसे वैष्णव पुरुष दूर रहे। जुआ खेलना, नींद लेना, पान खाना, दाँतुन करना, दूसरेकी निन्दा करना, चुगली खाना, चोरी करना, हिंसा करना, मैथुन करना, क्रोध करना और झूठ बोलना—एकादशीको ये ग्यारह बातें न करे। काँस, मांस, मदिरा, मधु, तेल, झूठ बोलना, व्यायाम करना, परदेशमें जाना, दुबारा भोजन, मैथुन, जो स्पर्श करने योग्य नहीं है उनका स्पर्श करना और मसूर खाना—द्वादशीको इन बारह वस्तुओंको न करे*। विप्रवर! इस प्रकार नियम करनेवाला पुरुष यदि शक्ति हो तो उपवास करे। यदि शक्ति न हो तो बुद्धिमान् पुरुष एक समय भोजन करके रहे, किंतु रातमें भोजन न करे। अथवा अयाचित वस्तु (बिना माँगे मिली हुई चीज)—को उपयोग करे, किंतु ऐसे महत्त्वपूर्ण व्रतका त्याग न करे।

बारह महीनोंके द्वादशी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा तथा आठ महाद्वादशियोंका निरूपण

सनातनजी कहते हैं—अनघ! अब मैं तुमसे द्वादशीके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, जिनका पालन करके मनुष्य भगवान् विष्णुका अत्यन्त प्रिय होता है। चैत्र शुक्ला द्वादशीको 'मदनव्रत'का आचरण करे। सफेद चावलसे भरे हुए एक नूतन कलशकी स्थापना करे, जिसमें कोई छेद न हो। वह अनेक प्रकारके फलोंसे युक्त इक्षुदण्डसंयुक्त दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित, श्वेत चन्दनसे चर्चित, नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंसे सम्पन्न तथा अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुशोभित हो। उसके ऊपर गुड़सहित ताँबेका पात्र रखे। उस पात्रमें कामस्वरूप भगवान् अच्युतका गन्ध आदि उपचारोंसे पूजन करे। द्वादशीको उपवास करके दूसरे दिन प्रातः-काल पुनः भगवान्‌की पूजा करे। वहाँ चढ़ी हुई वस्तुएँ ब्राह्मणको दे दे। फिर ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक द्वादशीको यह व्रत करके आचार्यको घृत-धेनुसहित सब सामग्रियोंसे युक्त शय्यादान दे। तदनन्तर वस्त्र आदिसे ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करके उन्हें सुवर्णमय कामदेव तथा दूध देनेवाली श्वेत गौ दान करे। दान करते समय यह कहे कि 'कामरूपी श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों।' जो इस विधिसे 'मदनद्वादशीव्रत'-का पालन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुकी समता प्राप्त कर लेता है। इसी तिथिको 'भर्तृद्वादशी'का व्रत बताया गया है। इसमें सुन्दर शय्या बिछाकर उसपर लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको स्थापित करके उनके ऊपर फूलोंसे मण्डप बनावे। तत्पश्चात् व्रती पुरुष गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान्‌की पूजा करे। माङ्गलिक गीत, वाद्य आदिके द्वारा रातमें जागरण करे, फिर दूसरे दिन प्रातःकाल शय्यासहित भगवान् विष्णुकी


* अथ ते नियमान् वच्मि व्रते ह्यस्मिन् दिनत्रये। कांस्यं मांसं मसूरात्रं चणकान् कोद्रवांस्तथा ॥
शाकं मधु परान्नं च पुनर्भाजनमैथुने। दशम्यां दश वस्तूनि वर्जयेद्वैष्णवः सदा ॥
द्यूतक्रीडां च निद्रां च ताम्बूलं दन्तधावनम्। परापवादं पैशुन्यं स्तेयं हिंसां तथा रतिम् ॥
कोपं ह्यनृतवाक्यं च एकादश्यां विवर्जयेत्। कांस्यं मांसं सुरां क्षौद्रं तैलं वितथभाषणम् ॥
व्यायामं च प्रवासं च पुनर्भाजनमैथुने। अस्पृश्यस्पर्शमासूरे द्वादश्यां द्वादश त्यजेत् ॥
(ना० पूर्व० १२०। ८६-९०)