संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५८१
नक्षत्रका संयोग हो तो एकादशी और द्वादशी दोनों दिन व्रत रहने चाहिये। विप्रवर! इनके सिवा अन्यत्र द्वादशीको एक समय भोजन करके व्रत रहना चाहिये। यह व्रत स्वभावसे ही सब पातकोंका नाश करनेवाला बताया गया है। द्वादशीसहित एकादशीका व्रत नित्य माना गया है, अतः यहाँ उसका उद्यापन नहीं कहा गया। इसे जीवनपर्यन्त करते रहना चाहिये।
त्रयोदशी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा
सनातनजी कहते हैं—नारद! अब मैं तुम्हें त्रयोदशीके व्रत बतलाता हूँ, जिनका भक्तिपूर्वक पालन करके मनुष्य इस पृथ्वीपर सौभाग्यशाली होता है। चैत्र कृष्णपक्षकी त्रयोदशी शनिवारसे युक्त हो तो 'महावारुणी' मानी गयी है। यदि उसमें गङ्गा-स्नानका अवसर मिले तो वह कोटि सूर्यग्रहणोंसे अधिक फल देनेवाली है। चैत्रके कृष्णपक्षमें त्रयोदशीको शुभ योग, शतभिषा नक्षत्र और शनिवारका योग हो तो वह 'महामहावारुणी'—के नामसे विख्यात होती है। ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशीको 'सौभाग्यशमनव्रत' होता है। उस दिन नदीके जलमें स्नान करके पवित्र स्थानमें उत्पन्न हुए सफेद मदार, आक और लाल कनेरकी पूजा करे। उस समय आकाशमें सूर्यकी ओर देखकर निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रार्थना करे—
मन्दारकरवीराका भवन्तो भास्करांशजाः।
पूजिता मम सौभाग्यं नाशयन्तु नमोऽस्तु वः॥
(ना० पूर्व० १२२। २०-२१)
'मदार! कनेर! और आक! आप लोग भगवान् भास्करके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। अतः पूजित होकर मेरे दुर्भाग्यका नाश करें, आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक एक-एक वर्षतक इन तीनों वृक्षोंकी पूजा करता है, उसका दुर्भाग्य नष्ट हो जाता है। आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशीको एक समय भोजनका व्रत करे। भगवती पार्वती और भगवान् शङ्कर—इन दोनों जगदीश्वरोंकी यथाशक्ति सोने, चाँदी अथवा मिट्टीकी मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करे। भगवती उमा सिंहपर बैठी हों और भगवान् शङ्कर वृषभपर। नारद!
इन दोनों प्रतिमाओंको देवमन्दिर, गोशाला अथवा ब्राह्मणके घरमें वेदमन्त्रद्वारा स्थापित करके लगातार पाँच दिनतक नित्य पूजन तथा एक समय भोजनके व्रतका पालन करे। तदनन्तर अन्तिम दिन प्रातःकाल स्नान करके पुनः उन दोनों प्रतिमाओंकी पूजा करे। फिर वेद-वेदाङ्गके ज्ञानसे सुशोभित ब्राह्मणको वे दोनों विग्रह समर्पित कर दे। पाँच वर्षोंतक प्रतिवर्ष इसी प्रकार करना चाहिये। पाँचवाँ वर्ष बीतनेपर दूध देनेवाली दो गौओंके साथ उन दोनों प्रतिमाओंका