संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 595, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५९३
श्रीवृषभध्वज शिवका स्तवन किया, तदनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञासे वे आसनपर बैठे। उस समय योगियोंने उनका बड़ा सत्कार किया। जगद्गुरु सदाशिवने नारदजीकी कुशल पूछी। नारदजीने कहा- भगवन्! आपके प्रसादसे सब कुशल है। ब्राह्मणो! फिर सब योगियोंके सुनते हुए नारदजीने पशुओं (जीवों)-के अज्ञानमय पाशको छुड़ानेवाले पाशुपत (शाम्भव) ज्ञानके विषयमें प्रश्न किया। तब शरणागतवत्सल भगवान् शिवने उनकी भक्तिसे संतुष्ट हो उनसे आदरपूर्वक अष्टाङ्ग शिव-योगका वर्णन किया। लोककल्याणकारी भगवान् शङ्करसे शाम्भव ज्ञान प्राप्त करके प्रसन्नचित्त हो नारदजी बदरिकाश्रममें भगवान् नारायणके निकट गये। सदा आने-जानेवाले देवर्षि नारदने वहाँ भी सिद्धों और योगियोंसे सेवित भगवान् नारायणको बारम्बार संतुष्ट किया।
ब्राह्मणो! यह नारदमहापुराण है, जिसका मैंने तुम्हारे समक्ष वर्णन किया है। सम्पूर्ण शास्त्रोंका दिग्दर्शन करानेवाला यह उपाख्यान वेदके समान मान्य है। यह श्रोताओंके ज्ञानकी वृद्धि करनेवाला है। विप्रगण! जो इस नारदीय महापुराणका शिवालयमें, श्रेष्ठ द्विजोंके समाजमें, भगवान् विष्णुके मन्दिरमें, मथुरा और प्रयागमें, पुरुषोत्तम जगन्नाथजीके समीप, सेतुबन्ध रामेश्वरमें, काञ्ची, द्वारका, हरद्वार और कुशस्थलमें, त्रिपुष्कर तीर्थमें, किसी नदीके तटपर अथवा जहाँ-कहीं भी भक्तिभावसे कीर्तन करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञों और तीर्थोंका महान् फल पाता है। सम्पूर्ण दानों और समस्त तपस्याओंका भी पूरा-पूरा फल प्राप्त कर लेता है। जो उपवास करके या हविष्य भोजन करके इन्द्रियोंको काबूमें रखते हुए भगवान् नारायण या शिवकी भक्तिमें तत्पर हो इस पुराणका श्रवण अथवा प्रवचन करता है, वह सिद्धि पाता है। इस पुराणमें सब प्रकारके पुण्यों और सिद्धियोंके उद्भवका वर्णन किया गया है, जो सदा पढ़ने और सुननेवाले पुरुषोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यह मनुष्योंके कलिसम्बन्धी दोषको हर लेता है और सब सम्पत्तियोंकी वृद्धि करता है। यह सभीको अभीष्ट है। यह तपस्या, व्रत और उनके फलोंका प्रकाशक है। मन्त्र, यन्त्र, पृथक्-पृथक् वेदाङ्ग, आगम, सांख्य और वेद-सबका इसमें संक्षेपसे संग्रह किया गया है। इस वेदसम्मित नारदीय महापुराणका श्रवण करके धन, रत्न और वस्त्र आदिके द्वारा भक्तिभावसे पुराणवाचक आचार्यकी पूजा करनी चाहिये। भूमिदान, गोदान, रत्नदान तथा हाथी, घोड़े और रथके दानसे आचार्यको सदैव संतुष्ट करना चाहिये। ब्राह्मणो! यह पुराण धर्मका संग्रह करनेवाला तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है। जो इसकी व्याख्या करता है, उसके समान मनुष्योंका गुरु दूसरा कौन हो सकता है। शरीर, मन, वाणी और धन आदिके द्वारा सदा धर्मोपदेशक गुरुका प्रिय करना चाहिये। इस पुराणको विधिपूर्वक सुनकर देवपूजन और हवन करके सौ ब्राह्मणोंको मिठाई और खीरका भोजन कराना चाहिये तथा भक्तिभावसे उन्हें दक्षिणा देनी चाहिये; क्योंकि भगवान् माधव भक्तिसे ही संतुष्ट होते हैं। जैसे नदियोंमें गङ्गा, सरोवरोंमें पुष्कर, पुरियोंमें काशीपुरी, पर्वतोंमें मेरु, तीनों देवताओंमें सबका पाप हरनेवाले भगवान् नारायण, युगोंमें सत्ययुग, वेदोंमें सामवेद, पशुओंमें धेनु, वर्णोंमें ब्राह्मण, देने योग्य तथा पोषक वस्तुओंमें अन्न और जल, मासोंमें मार्गशीर्ष, मृगोंमें सिंह, देहधारियोंमें पुरुष, वृक्षोंमें पीपल, दैत्योंमें प्रह्लाद, अङ्गोंमें मुख, अश्वोंमें उच्चैःश्रवा, ऋतुओंमें वसन्त, यज्ञोंमें जपयज्ञ, नागोंमें शेष, पितरोंमें अर्यमा, अस्त्रोंमें धनुष, वसुओंमें पावक, आदित्योंमें विष्णु, देवताओंमें