भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 599
  • उत्तरभाग * ५९७

इच्छावाले मनुष्योंको चाहिये कि द्वितीया, अष्टमी, षष्ठी और एकादशी तिथियाँ यदि पूर्वविद्धा हों अर्थात् पहलेवाली तिथिसे संयुक्त हों तो उस दिन व्रत न करें। द्विजवरो ! सप्तमी, अमावास्या, पूर्णिमा तथा पिताका वार्षिक श्राद्धदिन—इन दिनोंमें पूर्वविद्धा तिथि ही ग्रहण करनी चाहिये। सूर्योदयके समय यदि थोड़ी भी पूर्व तिथि हो तो उससे वर्तमान तिथिको पूर्वविद्धा माने, यदि उदयके पूर्वसे ही वर्तमान तिथि आ गयी हो तो उसे 'प्रभूता' समझे। पारण तथा मनुष्यके मरणमें तत्कालवर्तिनी तिथि ग्रहण करने योग्य मानी गयी है। पितृकार्यमें वही तिथि ग्राह्य है जो सूर्यास्तकालमें मौजूद रहे। विप्रवरो ! तिथिका प्रमाण सूर्य और चन्द्रमाकी गतिपर निर्भर है। चन्द्रमा और सूर्यकी गतिका ज्ञान होनेसे कालवेत्ता विद्वान् तिथिके कालका मान समझते हैं।

इसके बाद, अब मैं स्नान, पूजा आदिकी विधिका क्रम बताऊँगा, यदि दिन शुद्ध न मिले तो रातमें पूजा की जाती है। दिनका सारा कार्य प्रदोष (रात्रिके आरम्भकाल)-में पूर्ण करना चाहिये। यह विधि व्रत करनेवाले मनुष्योंके लिये बतायी गयी है। विप्रवरो ! यदि अरुणोदयकालमें थोड़ी भी द्वादशी हो तो उसमें स्नान, पूजन, होम और दान आदि सारे कार्य करने चाहिये। द्वादशीमें व्रत करनेपर शुद्ध त्रयोदशीमें पारण हो तो पृथ्वीदानका फल मिलता है। अथवा वह मनुष्य सौ यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी अधिक पुण्य प्राप्त कर लेता है। विप्रगण ! यदि आगे द्वादशीयुक्त दिन न दिखायी दे तो (अर्थात् द्वादशीयुक्त त्रयोदशी न हो तो) प्रातःकाल ही स्नान करना चाहिये और देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करके द्वादशीमें ही पारण कर लेना चाहिये। इस द्वादशीका यदि मनुष्य उल्लङ्घन करे तो वह बहुत बड़ी हानि करनेवाली होती है। ठीक उसी प्रकार जैसे विद्याध्ययन करके समावर्तन-संस्कारद्वारा मनुष्य स्नातक न बने तो वह सरस्वती उस विद्वान्के धर्मका अपहरण करती है। क्षयमें, वृद्धिमें अथवा सूर्योदयकालमें भी पवित्र द्वादशी तिथि प्राप्त हो तो उसीमें उपवास करना चाहिये, किंतु पूर्व तिथिसे विद्ध होनेपर उसका अवश्य त्याग कर देना चाहिये।

**ब्राह्मणोंने पूछा—**सूतजी ! जब पहले दिनकी एकादशीमें द्वादशीका संयोग न प्राप्त होता हो तो मनुष्योंको किस प्रकार उपवास करना चाहिये ? यह बतलाइये। उपवासका दिन जब पूर्व तिथिसे विद्ध हो और दूसरे दिन जब थोड़ी भी एकादशी न हो तो उसमें किस प्रकार उपवास करनेका विधान है ? इसे भी स्पष्ट कीजिये।

**सौतिने कहा—**ब्राह्मणो ! यदि पहले दिनकी एकादशीमें आधे सूर्योदयतक भी द्वादशीका संयोग न मिलता हो तो दूसरे दिन ही व्रत करना चाहिये। अनेक शास्त्रोंमें परस्पर विरुद्ध वचन देखे जाते हैं और ब्राह्मण लोग भी विवादमें ही पड़े रहते हैं। ऐसी दशामें कोई निर्णय होता न देख पवित्र द्वादशी तिथिमें ही उपवास करे और त्रयोदशीमें पारण कर ले। जब एकादशी दशमीसे विद्ध हो और द्वादशीमें श्रवणका योग मिलता हो तो दोनों पक्षोंमें पवित्र द्वादशी तिथिको ही उपवास करना चाहिये।

**ऋषि बोले—**सूतपुत्र ! अब आप युगादि तिथियों तथा सूर्यसंक्रान्ति आदिमें किये जानेवाले पुण्य कर्मोंकी विधिका यथावत् वर्णन कीजिये; क्योंकि आपसे कोई बात छिपी नहीं है।

**सौतिने कहा—**अयनका पुण्यकाल, जिस दिन अयनका आरम्भ हो, उस पूरे दिनतक मानना चाहिये। संक्रान्तिका पुण्यकाल सोलह घटीतक होता है। विषुवकालको अक्षय पुण्यजनक बताया गया है। द्विजश्रेष्ठगण ! दोनों पक्षोंकी दशमीविद्धा एकादशीका अवश्य त्याग करना चाहिये। जैसे वृषली स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाला