संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
ब्रह्माजीके द्वारा यमराजको भगवान् तथा उनके भक्तोंकी श्रेष्ठता बताना
ब्रह्माजी बोले—धर्मराज ! तुमने क्या आश्चर्यकी बात देखी है? क्यों इतने खिन्न हो रहे हो? किसीके उत्तम गुणोंको देखकर जो मनमें संताप होता है, वह मृत्युके तुल्य माना गया है। सूर्यनन्दन ! जिनके नामका उच्चारण करनेमात्रसे परम पद प्राप्त हो जाता है, उन्हींकी प्रीतिके लिये उपवास करके मनुष्य वैकुण्ठधामको क्यों न जाय ? भगवान् श्रीकृष्णके लिये किया हुआ एक बारका प्रणाम दस अश्वमेध-यज्ञोंके अवभृथ-स्नानके समान है। फिर भी इतना अन्तर है कि दस अश्वमेध-यज्ञ करनेवाला मनुष्य पुण्यभोगके पश्चात् पुनः इस संसारमें जन्म लेता है; परंतु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला पुरुष फिर संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता*। जिसकी जिह्वाके अग्रभागपर 'हरि' यह दो अक्षर विराजमान है, उसे कुरुक्षेत्र, काशी और विरजतीर्थके सेवनकी क्या आवश्यकता है? क्योंकि जो खिलवाड़में भी भगवान् विष्णुके नामका उच्चारण और श्रवण कर लेता है, वह मनुष्य गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे प्राप्त हुई पवित्रताके तुल्य पवित्रता प्राप्त कर लेता है। त्रिभुवननाथ पुरुषोत्तम हमारे जन्मदाता हैं, उनके दिन (एकादशी)-का सेवन करनेवाले पुरुषपर शासन कैसे चल सकता है ? जो राजकर्मचारी इस पृथ्वीपर राजाके श्रेष्ठ भक्तोंको नहीं जानता, वह उनके विरुद्ध सम्पूर्ण प्रयास करके भी फिर उन्हींके द्वारा दण्डनीय होता है। अतः राजकार्यमें नियुक्त हुए पुरुषको चाहिये कि वे अपराधी होनेपर भी राजाके प्रिय जनोंपर शासन न करें, क्योंकि वे स्वामीके प्रसादसे सिद्ध (कृतकार्य) होते हैं और शासकपर भी शासन कर सकते हैं। सूर्यनन्दन ! इसी प्रकार जो पापी होनेपर भी भगवान् जनार्दनके चरणोंकी शरणमें जा चुके हैं, उनपर तुम्हारा शासन कैसे चल सकता है? उनपर शासन करना तो मूर्खताका ही सूचक है। धर्मराज ! यदि भगवान् शिवके, सूर्यके अथवा मेरे भक्तोंसे तुम्हारा विवाद हो तो मैं तुम्हारी कुछ सहायता कर सकता हूँ; किंतु भास्करनन्दन ! विष्णुभक्तोंके साथ सामना होनेपर मैं कोई सहायता नहीं कर सकूँगा; क्योंकि भगवान् पुरुषोत्तम सभी देवताओंके आदि हैं। भगवान् मधुसूदनके भक्तोंको दण्ड देना सम्भव नहीं है। जिन्होंने किसी बहानेसे भी दोनों पक्षोंकी (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीका सेवन किया है, उनके द्वारा यदि तुम्हारा अपमान हुआ है तो उसमें मैं तुम्हारा सहायक नहीं हो सकता।
यमराजकी इच्छा-पूर्ति और भक्त रुक्माङ्गदका गौरव बढ़ानेके लिये ब्रह्माजीका अपने मनसे एक सुन्दरी नारीको प्रकट करना, नारीके प्रति वैराग्यकी भावना तथा उस सुन्दरी 'मोहिनी' का मन्दराचलपर जाकर मोहक संगीत गाना
यमराजने कहा—तात! वेद जिनके चरण हैं, उन भगवान्को नमस्कार करनेमें ही सबका हित है; इस बातको मैंने भी समझा है। जगत्पते ! फिर भी जबतक राजा रुक्माङ्गद पृथ्वीका शासन करता है, तबतक मेरा चित्त शान्त नहीं रह सकता। देवश्रेष्ठ ! यदि एकमात्र रुक्माङ्गदको ही आप एकादशीके दिन धैर्यसे विचलित कर दें, तो मैं आपका किङ्कर बना रहूँगा। देव ! उसने मेरे पटका लेख मिटा दिया है। आजसे जो मानव देवताओंके स्वामी भगवान् विष्णुका स्मरण,
* एको हि कृष्णस्य कृतप्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः। दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥
(ना० उत्तर० ६।३)