संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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तुम्हारे लिये जीवनसे भी अधिक महत्त्व रखता है। तुम्हारे पति राजा रुक्माङ्गद यदि एकादशीके दिन भोजन नहीं करेंगे तो वे अपने हाथमें तलवार लेकर धर्माङ्गदके चन्द्रमण्डल-सदृश सुन्दर एवं मनोहर कुण्डलभूषित मस्तकको, जिसमें अभी मूँछ नहीं उगी है, काटकर तुरंत मेरी गोदमें गिरा दें।'
मोहिनीका वह कड़वे अक्षरोंसे युक्त वचन सुनकर देवी संध्यावली शीतपीड़ित कदलीके समान क्षणभरके लिये काँप उठी। तदनन्तर श्रेष्ठ वर्णवाली महारानी धैर्य धारण कर हँसती हुई सुन्दर मुखवाली मोहिनीसे बोली—'सुभ्रु! पुराणोंमें द्वादशी (एकादशी)-के सम्बन्धमें वर्णित कुछ गाथाएँ सुनी जाती हैं, जो स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं—धनको त्याग दे; स्त्री, जीवन और घरको भी छोड़ दे; देश, राजा और मित्रको भी त्याग दे; अत्यन्त प्रिय व्यक्तिको भी त्याग दे; परंतु दोनों पक्षोंकी पवित्र द्वादशी (एकादशी)- का त्याग न करे; क्योंकि पुत्र, भाई, सुहृद् और प्रियजन—सब सम्बन्धी यहीं काम देते हैं, किंतु द्वादशी (एकादशी) इहलोक और परलोकमें भी अभीष्ट साधन करती है। अतः द्वादशी (एकादशी)- के प्रभावसे सब मङ्गल ही होगा। शुभे! मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये धर्माङ्गदका मस्तक दिलाऊँगी। शोभने! मेरी बातपर विश्वास करो और सुखी हो जाओ। भद्रे! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास सुना जाता है, उसे मैं कहती हूँ, तुम सावधान होकर सुनो।
पूर्वकालमें विरोचन नामसे प्रसिद्ध एक धर्मपरायण दैत्य थे। उनकी पत्नी विशालाक्षी ब्राह्मणपूजनमें तत्पर रहती थी। सुभ्रु! वह प्रतिदिन प्रातःकाल एक ऋषिको बुलाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करती और प्रसन्नचित्त हो, भक्तिभावसे उनका चरणोदक लेती थी। उन दिनों हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर सब देवता प्रह्लादपुत्र विरोचनसे भी सदा शंकित रहते थे। एक दिन वे इन्द्र आदि देवता बृहस्पतिजीकी सलाह लेते हुए बोले— 'हम लोग शत्रुओंसे बहुत पीड़ित हैं, इस समय हमें क्या करना चाहिये?' उनका वह वचन सुनकर देवगुरु बृहस्पतिने कहा—'देवताओ! आज दुःखमें पड़े हुए तुम सब लोगोंको अपना यह कष्ट भगवान् विष्णुसे निवेदन करना चाहिये।' अमित-तेजस्वी गुरुका यह भाषण सुनकर सब देवता विरोचनके प्राणनाशका संकल्प लेकर भगवान् विष्णुके समीप गये। वहाँ जाकर उन्होंने अनेक प्रकारके स्तुतियोंसे सुरश्रेष्ठ श्रीहरिका स्तवन किया।
देवता बोले—देवताओंके भी अधिदेवता अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। भक्तोंके विघ्नका निवारण करनेवाले नरहरिको नमस्कार है। महात्मा वामनको नमस्कार है। वाराहरूपधारी भगवान्को नमस्कार है। प्रलयकालीन समुद्रमें निवास करनेवाले मत्स्यरूप माधवको नमस्कार है। पीठपर मन्दराचलको धारण करनेवाले भगवान् कूर्मको नमस्कार है। भृगुनन्दन परशुराम तथा क्षीरसागरशायी भगवान् नारायणको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी श्रीरामको नमस्कार है। विश्वके शासक तथा साक्षीरूप श्रीहरिको नमस्कार है। शुद्ध दत्तात्रेय-स्वरूप और दूसरोंकी पीड़ा दूर करनेवाले कपिलरूपधारी भगवान्को नमस्कार है। धर्मको धारण करनेवाले सनकादि महात्मा जिनके स्वरूप हैं, उन यज्ञमय भगवान्को नमस्कार है। ध्रुवको वरदान देनेवाले नारायणको नमस्कार है। महान् पराक्रमी पृथुको प्रणाम है। विशुद्ध अन्तःकरणवाले ऋषभको और हयग्रीवावतारधारी श्रीहरिको नमस्कार है। आगमस्वरूप भगवान् हंसको नमस्कार है तथा अमृत-कलश धारण करनेवाले धन्वन्तरिको नमस्कार