भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 659
  • उत्तरभाग * ६५७

पूजनीय हैं। प्रभासतीर्थमें सूर्यग्रहणके समय सहस्र गोदान करनेसे मनुष्य जो फल पाता है, वह गङ्गाजीके तटपर एक दिन रहनेसे ही मिल जाता है। जो अन्य सारे उपायोंको छोड़कर मोक्षकी कामना लिये दृढ़निश्चयके साथ गङ्गाजीके तटपर सुखपूर्वक रहता है, वह अवश्य ही मोक्षका भागी होता है, विशेषतः काशीपुरीमें गङ्गाजी तत्काल मोक्ष देनेवाली हैं। यदि जीवनभर प्रतिमासकी चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा गङ्गाजीके तटपर निवास किया जाय तो वह उत्तम सिद्धि देनेवाला है। मनुष्य सदा कृच्छ्र और चान्द्रायण करके सुखपूर्वक जिस फलका अनुभव करता है, वही उसे गङ्गाजीके तटपर निवास करनेमात्रसे मिल जाता है। ब्रह्मपुत्री! इस लोकमें गङ्गाजीकी सेवामें तत्पर रहनेवाले मनुष्यको आधे दिनके सेवनसे जो फल प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भी नहीं मिल सकता। सम्पूर्ण यज्ञ, तप, दान, योग तथा स्वाध्याय-कर्मसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही भक्तिभावसे गङ्गाजीके तटपर निवास करनेमात्रसे मिल जाता है। सत्य-भाषण, नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन तथा अग्निहोत्रके सेवनसे मनुष्योंको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गङ्गातटपर निवास करनेसे ही मिल जाता है। गङ्गाजीके भक्तको संतोष, उत्तम ऐश्वर्य, तत्त्वज्ञान, सुखस्वरूपता तथा विनय एवं सदाचार-सम्पत्ति प्राप्त होती है। मनुष्य केवल गङ्गाजीको ही पाकर कृतकृत्य हो जाता है^२। जो भक्तिभावसे गङ्गाजीके जलका स्पर्श करता और गङ्गाजल पीता है, वह मनुष्य अनायास ही मोक्षका उपाय प्राप्त कर लेता है^३। जिनके सम्पूर्ण कृत्य सदा गङ्गाजलसे ही सम्पन्न होते हैं, वे मनुष्य शरीर त्यागकर भगवान् शिवके समीप आनन्दका अनुभव करते हैं^४। जैसे इन्द्र आदि देवता अपने मुखसे चन्द्रमाकी किरणोंमें स्थित अमृतका पान करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य गङ्गाजीका जल पीते हैं। विधिपूर्वक कन्यादान और भक्तिपूर्वक भूमिदान, अन्नदान, गोदान, स्वर्णदान, रथदान, अश्वदान और गजदान आदि करनेसे जो पुण्य बताया गया है, उससे सौ गुना अधिक पुण्य चुल्लूभर गङ्गाजल पीनेसे होता है। सहस्रों चान्द्रायणव्रतका जो फल कहा गया है, उससे अधिक फल गङ्गाजल पीनेसे


१. मनोवाक्कायजैर्ग्रस्तः पापैर्बहुविधैरपि। वीक्ष्य गङ्गां भवेत् पूतः पुरुषो नात्र संशयः॥
गङ्गातोयाभिषिक्तां तु भिक्षामश्नाति यः सदा। सर्पवत्कञ्चुकं मुक्त्वा पापहीनो भवेत् स वै॥
हिमवद्विन्ध्यसदृशा राशयः पापकर्मणाम्। गङ्गाम्भसा विनश्यन्ति विष्णुभक्त्या यथापदः॥
प्रवेशमात्रे गङ्गायां स्नानार्थं भक्तितो नृणाम्। ब्रह्महत्यादिपापानि हाहेत्युक्त्वा प्रयान्त्यलम्॥
गङ्गातीरे वसेन्नित्यं गङ्गातोयं पिबेत् सदा। यः पुमान् स विमुच्येत पातकैः पूर्वसंचितैः॥
यो वै गङ्गां समाश्रित्य नित्यं तिष्ठति निर्भयः। स एव देवैर्मर्त्यैश्च पूजनीयो महर्षिभिः॥
(ना० उत्तर० ३८। ३२-३७)
२. संतोषः परमैश्वर्यं तत्त्वज्ञानं सुखात्मता॥ विनयाचारसम्पत्तिर्गङ्गाभक्तस्य जायते।
(ना० उत्तर० ३८। ४९-५०)
३. भक्त्या तज्जलसंस्पर्शी तज्जलं पिबते च यः॥ अनायासेन हि नरो मोक्षोपायं स विन्दति।
(ना० उत्तर० ३८। ५१-५२)
४. सर्वाणि येषां गङ्गायास्तोयैः कृत्यानि सर्वदा। देहं त्यक्त्वा नरास्ते तु मोदन्ते शिवसंनिधौ॥
(ना० उत्तर० ३८। ५३)