संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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कालविशेष और स्थलविशेषमें गङ्गा-स्नानकी महिमा
पुरोहित वसु कहते हैं—वामोरु! अब मैं कालविशेषमें किये जानेवाले गङ्गा-स्नानका फल बतलाऊँगा। जो मनुष्य माघ मासमें निरन्तर गङ्गा-स्नान करता है, वह दीर्घकालतक अपने समस्त कुलके साथ इन्द्रलोकमें निवास करता है। तदनन्तर दस लाख करोड़ कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें जाकर रहता है। सम्पूर्ण संक्रान्तियोंमें जो मनुष्य गङ्गाजीके जलमें स्नान करता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठधामको जाता है। विषुव योगमें उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन तथा संक्रान्तिके समय विशेषरूपसे उसका फल बताया गया है। माघके ही समान कार्तिकमें भी गङ्गा-स्नानका महान् फल माना गया है। मोहिनी! जब सूर्य मेष राशिमें प्रवेश करते हैं, उस समय तथा कार्तिक-पूर्णिमाको गङ्गा-स्नान करनेसे ब्रह्मा आदि देवताओंने माघस्नानकी अपेक्षा अधिक पुण्य बताया है। कार्तिक अथवा वैशाखमें अक्षयतृतीया तिथिको गङ्गा-स्नान करनेसे एक वर्षतक स्नान करनेका पुण्यफल प्राप्त होता है। मन्वादि और युगादि तिथियोंमें गङ्गा-स्नानका जो फल बताया गया है, तीन मासके निरन्तर स्नानसे भी वही फल प्राप्त होता है। द्वादशीको श्रवण, अष्टमीको पुष्य और चतुर्दशीको आर्द्रा नक्षत्रका योग होनेपर गङ्गा-स्नान अत्यन्त दुर्लभ है। वैशाख, कार्तिक और माघकी पूर्णिमा और अमावास्या बड़ी पवित्र मानी गयी हैं। इनमें गङ्गा-स्नानका सुयोग अत्यन्त दुर्लभ है। कृष्णाष्टमी (भाद्रपद कृष्णा अष्टमी)-को गङ्गा-स्नान करनेसे (साधारण तिथिके स्नानकी अपेक्षा) सहस्रगुना फल होता है। सभी पर्वोंमें सौगुना पुण्य प्राप्त होता है। माघ कृष्णा अष्टमी तथा अमावास्याको भी गङ्गा-स्नानसे सौगुना पुण्य होता है। उक्त दोनों तिथियोंको सूर्यके आधा उदय होनेपर 'अर्धोदय' योग होता है और आधासे कुछ कम उदय होनेपर 'महोदय' कहा गया है। महोदयमें गङ्गा-स्नान करनेसे सौगुना और अर्धोदयमें लाखगुना पुण्य बताया गया है। देवि! फाल्गुन और आषाढ़ मासमें तथा सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय किया हुआ गङ्गा-स्नान तीन मासके स्नानका फल देनेवाला है। अपने जन्मके नक्षत्रमें भक्तिभावसे गङ्गा-स्नान करनेपर आजन्म संचित पापोंका नाश हो जाता है। माघ कृष्णा चतुर्दशीको व्यतीपातयोग तथा कृष्णाष्टमी (भाद्रपद कृष्णा अष्टमी)-को विशेषतः वैधृतियोग गङ्गा-स्नानके लिये दुर्लभ है। जो मनुष्य पूरे माघभर विधिपूर्वक अरुणोदयकालमें गङ्गा-स्नान करता है, वह जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला) होता है। इतना ही नहीं, वह सम्पूर्ण शास्त्रोंका अर्थवेत्ता, ज्ञानी तथा नीरोग भी अवश्य होता है। संक्रान्तिमें, दोनों पक्षोंकी अन्तिम तिथिको तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणमें इच्छानुसार गङ्गा-स्नान करनेवाला मानव ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। चन्द्रग्रहणका स्नान लाखगुना बताया गया है और सूर्यग्रहणका स्नान उससे भी दस गुना अधिक माना गया है। वारुण-नक्षत्र (शतभिषा)-से युक्त चैत्र कृष्णा त्रयोदशी यदि गङ्गा-तटपर सुलभ हो जाय तो वह सौ सूर्यग्रहणके समान पुण्य देनेवाली है। ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको मङ्गलवार तथा हस्त नक्षत्रके योगमें भगवती भागीरथी हिमालयसे इस मर्त्यलोकमें उतरी थीं। इस तिथिको वह आद्यगङ्गा-स्नान करनेपर दसगुने पाप हर लेती हैं और अश्वमेधयज्ञका सौगुना पुण्य प्रदान करती हैं। 'हे जाह्नवी! मेरे जो महापातक-समुदायरूप पाप हैं, उन सबको तुम