संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 671, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * ६६१
| जो प्रतिदिन भक्तिभावसे इस स्तोत्रका पाठ करता है अथवा जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले पूर्वोक्त दस पापों तथा सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त हो जाता है। रोगी रोगसे और विपत्तिका मारा पुरुष विपत्तिसे छुटकारा पा जाता है। शत्रुओंसे, बन्धनसे तथा सब प्रकारके भयसे भी वह मुक्त हो जाता है। इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता है और मृत्युके पश्चात् परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है। जिसके घरमें इस स्तोत्रको लिखकर इसकी पूजा की जाती है, वहाँ आग और चोरका भय नहीं है। वहाँ पापसे भी भय नहीं होता। ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको गङ्गाजीके जलमें खड़ा होकर जो इस स्तोत्रका दस बार जप या पाठ करता है, वह दरिद्र अथवा असमर्थ होनेपर भी वही फल पाता है, जो पूर्वोक्त विधिसे भक्तिपूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनेसे प्राप्त होने योग्य बताया गया है। जैसी गौरी देवीकी महिमा है, वैसी ही गङ्गा देवीकी भी है, अतः गौरीके पूजनमें जो विधि | कही गयी है, वही गङ्गाजीके पूजनके लिये भी उत्तम विधि है। जैसे भगवान् शिव हैं, वैसे ही भगवान् विष्णु हैं, जैसे भगवान् विष्णु हैं, वैसी ही भगवती उमा हैं और जैसी भगवती उमा हैं, वैसी ही गङ्गाजी हैं—इनमें कोई भेद नहीं है। जो भगवान् विष्णु और शिवमें, गङ्गा और गौरीमें तथा लक्ष्मी और पार्वतीमें भेद मानता है, वह मूढ़बुद्धि है। उत्तरायणमें किसी उत्तम मासका शुक्लपक्ष हो, दिनका समय हो और गङ्गाजीके तटकी भूमि हो, साथ ही हृदयमें भगवान् जनार्दनका चिन्तन हो रहा हो—ऐसी अवस्थामें जो शरीरका त्याग करते हैं, वे धन्य हैं*। विघ्ननन्दिनी! जो मनुष्य गङ्गामें प्राणत्याग करते हैं, वे देवताओंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए विष्णुलोकको जाते हैं। जो मनुष्य गङ्गाके तटपर आमरण उपवासका व्रत लेकर मर जाता है, वह निश्चय ही अपने पितरोंके साथ परमधामको प्राप्त होता है। गङ्गाजीमें मृत्युके लिये दो योजन दूरकी भूमि और समीपका स्थान दोनों समान हैं। जो मनुष्य गङ्गामें मर जाता है, |
तापत्रितयहन्त्र्यै च प्राणेश्र्वर्यै नमो नमः। शान्त्यै संतापहारिण्यै नमस्ते सर्वमूर्तये॥
सर्वसंशुद्धिकारिण्यै नमः पापविमुक्तये। भुक्तिमुक्तिप्रदायिन्यै भोगवत्यै नमो नमः॥
मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु स्वर्गदायै नमो नमः। नमस्त्रैलोक्यमूर्तायै त्रिदशायै नमो नमः॥
नमस्ते शुक्लसंस्थायै क्षेमवत्यै नमो नमः। त्रिदशासनसंस्थायै तेजोवत्यै नमोऽस्तु ते॥
मन्दायै लिङ्गधारिण्यै नारायण्यै नमो नमः। नमस्ते विश्वमित्रायै रेवत्यै ते नमो नमः॥
बृहत्यै ते नमो नित्यं लोकधात्र्यै नमो नमः। नमस्ते विश्वमुख्यायै नन्दिन्यै ते नमो नमः॥
पृथ्व्यै शिवामृतायै च विरजायै नमो नमः। परावरगताद्यायै तारायै ते नमो नमः॥
नमस्ते स्वर्गसंस्थायै अभिन्नायै नमो नमः। शान्तायै ते प्रतिष्ठायै वरदायै नमो नमः॥
उग्रायै मुखजल्पायै संजीवन्यै नमो नमः। ब्रह्मगायै ब्रह्मदायै दुरितघ्न्यै नमो नमः॥
प्रणतार्तिप्रभञ्जिन्यै जगन्मात्रे नमो नमः। विप्लुषायै दुर्गहन्त्र्यै दक्षायै ते नमो नमः॥
सर्वापत्प्रतिपक्षायै मङ्गलायै नमो नमः।
परापरे परे तुभ्यं नमो मोक्षप्रदे सदा। गङ्गा ममाग्रतो भूयाद् गङ्गा मे पार्श्वयोस्तथा॥
गङ्गा मे सर्वतो भूयात्त्वयि गङ्गेऽस्तु मे स्थितिः। आदौ त्वमन्ते मध्ये च सर्वा त्वं गाङ्गते शिवे॥
त्वमेव मूलप्रकृतिस्त्वं हि नारायणः प्रभुः। गङ्गे त्वं परमात्मा च शिवस्तुभ्यं नमो नमः॥
(ना० उत्तर० ४३।६९-८४)
* शुक्लपक्षे दिवा भूमौ गङ्गायामुत्तरायणे। धन्या देहं विमुञ्चन्ति हृदयस्थे जनार्दने॥
(ना० उत्तर० ४३। ९४)