संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 676, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें६७४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
नामक तीर्थमें जाय, जहाँ पितृलोकका पालन करनेवाले साक्षात् धर्मराज विराजमान हैं। वहाँ जानेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। तदनन्तर मनुष्य परम उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाय, वहाँ ब्रह्माजीके समीप जानेसे राजसूय-यज्ञका फल मिलता है। तदनन्तर फल्गुतीर्थमें जाय। वह प्रचुर फल-मूलसे सम्पन्न और विख्यात है। वहीं कौशिकी नदी है, जहाँ किया हुआ श्राद्ध अक्षय माना गया है। वहाँसे उस पर्वतपर जाय, जो परम पुण्यात्मा, धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा सुरक्षित रहा है। वहीं गयशिर नामका सरोवर है, जहाँ पुण्यसलिला महानदी विद्यमान हैं। ऋषियोंसे सेवित परम पुण्यमय ब्रह्मसरोवर नामक तीर्थ भी वहीं है, जहाँ भगवान् अगस्त्य वैवस्वत यमसे मिले थे और जहाँ सनातन धर्मराज निरन्तर निवास करते हैं। वहाँ सब सरिताओंका उद्गम दिखायी देता है और पिनाकपाणि महादेव वहाँ नित्य निवास करते हैं। लोकविख्यात अक्षयवट भी वहीं है। पूर्वकालमें यजमान राजा गयने वहाँ यज्ञ किया था। वहाँ प्रकट हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा गयके यज्ञोंमें सुरक्षित थीं। मुण्डपृष्ठ, गया, रैवत, देवगिरि, तृतीय, क्रौञ्चपाद—इन सबका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवनदीमें शिवकरका, गयामें गदाधरका और सर्वत्र परमात्माका दर्शन करके मनुष्य पापराशिसे मुक्त हो जाता है। काशीमें विशालाक्षी, प्रयागमें ललितादेवी, गयामें मङ्गलादेवी तथा कृतशौचतीर्थमें सैंहिकादेवीका दर्शन करनेसे भी उक्त फलकी प्राप्ति होती है। गयामें रहकर मनुष्य जो कुछ दान करता है, वह सब अक्षय होता है। उसके उत्तम कर्मसे पितर प्रसन्न होते हैं। पुत्र गयामें स्थित होकर जो अन्नदान करता है, उसीसे पितर अपनेको पुत्रवान् मानते हैं।
गयामें प्रथम और द्वितीय दिनके कृत्यका वर्णन, प्रेतशिला आदि तीर्थोंमें पिण्डदान आदिकी विधि और उन तीर्थोंकी महिमा
**पुरोहित वसु कहते हैं—**मोहिनी! सुनो, अब मैं प्रेतशिलाका पवित्र माहात्म्य बतलाता हूँ, जहाँ पिण्डदान करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार करता है। प्रभासात्रिने शिलाके चरणप्रान्तको आच्छादित कर रखा है। मुनियोंसे संतुष्ट हुए प्रभास शिलाके अङ्गुष्ठभागसे प्रकट हुए। अङ्गुष्ठभागमें ही भगवान् शङ्कर स्थित हैं। इसलिये वे प्रभासेश कहे गये हैं। शिलाके अङ्गुष्ठका जो एक देश है, उसीमें प्रभासेशकी स्थिति है और वहीं प्रेतशिलाकी स्थिति है। वहाँ पिण्डदान करनेसे मनुष्य प्रेतयोनिसे मुक्त हो जाता है, इसीलिये उसका नाम 'प्रेतशिला' है। महानदी तथा प्रभासात्रिके सङ्गममें स्नान करनेवाला पुरुष साक्षात् वामदेव (शिव)-स्वरूप हो जाता है। इसीलिये उक्त सङ्गमको 'वामतीर्थ' कहा गया है। देवताओंके प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीरामने जब महानदीमें स्नान किया, तभीसे वहाँ सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाला 'रामतीर्थ' प्रकट हुआ। मनुष्य अपने सहस्रों जन्मोंमें जो पापराशि संग्रह करते हैं, वह सब रामतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाती है। जो मनुष्य—
राम राम महाबाहो देवानांमभयंकर॥
त्वां नमस्ये तु देवेश मम नश्यतु पातकम्।
(ना० उत्तर० ४५। ८-९)
'महाबाहु राम! देवताओंको अभय देनेवाले श्रीराम! आपको नमस्कार करता हूँ। देवेश! मेरा पातक नष्ट हो जाय।'
—इस मन्त्रद्वारा रामतीर्थमें स्नान करके श्राद्ध एवं पिण्डदान करता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। प्रभासेश्वरको नमस्कार करके भासमान शिवके समीप जाना चाहिये और उन भगवान्