भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 682, कुल 770 में से

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पृष्ठ 682

६८० * संक्षिप्त नारदपुराण *

है, वह सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका स्वरूप है। मैं पितरोंकी तृप्तिके लिये उसका अभिषेक करता हूँ।'

एक मुनि हाथमें जलसे भरा हुआ घड़ा और कुशका अग्रभाग लेकर आमकी जड़में पानी दे रहे थे। उन्होंने आमको भी सींचा और पितरोंको भी तृप्त किया। उनकी एक ही क्रिया दो प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली हुई। ब्रह्मयूपकी परिक्रमा करके मनुष्य वाजपेय-यज्ञका फल पाता है और ब्रह्माजीको नमस्कार करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें ले जाता है। (निम्नाङ्कित मन्त्रसे ब्रह्माजीको नमस्कार करना चाहिये—)

ॐ नमो ब्रह्मणेऽजाय जगज्जन्मादिकारिणे।
भक्तानां च पितॄणां च तारकाय नमो नमः॥ ९॥

'जगत्की सृष्टि, पालन आदि करनेवाले सच्चिदानन्द-स्वरूप अजन्मा ब्रह्माजीको नमस्कार है। भक्तों और पितरोंके उद्धारक पितामहको बारम्बार नमस्कार है।'

तत्पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्रसे इन्द्रिय-संयमपूर्वक यमराजके लिये बलि दे—

यमराजधर्मराजौ निश्चलार्था इति स्थितौ।
ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि पितॄणां मुक्तिहेतवे॥ १०-११॥

'यमराज और धर्मराज—दोनों सुस्थिर प्रयोजनवाले हैं। मैं पितरोंकी मुक्तिके लिये उन दोनोंको बलि अर्पित करता हूँ।'

मोहिनी! इसके बाद 'द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ'— इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रसे कुत्तोंके लिये बलि देकर नीचे लिखे मन्त्रद्वारा संयमपूर्वक काकबलि समर्पित करे—

ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।
वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयार्पितम् ॥ १२-१३॥

'पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, वायव्य कोण तथा नैर्ऋत्यकोणके कौए भूमिपर मेरे दिये हुए इस पिण्डको ग्रहण करें।'

तत्पश्चात् हाथमें कुश लेकर ब्रह्मतीर्थमें स्नान करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष तीसरे दिनका नियम समाप्त करके भगवान् गदाधरको नमस्कार करे और ब्रह्मचर्य पालन करता रहे। चौथे दिन फल्गुतीर्थमें स्नान आदि कार्य करे। फिर गयाशिरमें 'पद' पर पिण्डदानसहित श्राद्ध करे। वहाँ फल्गुतीर्थमें साक्षात् 'गयाशिर' का निवास है। क्रौञ्चपादसे लेकर फल्गुतीर्थतक—साक्षात् गयाशिर है। गयाशिरपर वृक्ष, पर्वत आदि भी हैं, किंतु वह साक्षात् रूपसे फल्गुतीर्थस्वरूप है। फल्गुतीर्थ गयासुरका मुख है। अतः वहाँ स्नान करके श्राद्ध करना चाहिये। आदिदेव भगवान् गदाधर व्यक्त और अव्यक्त रूपका आश्रय ले पितरोंकी मुक्तिके लिये विष्णुपद आदिके रूपमें विद्यमान हैं। वहाँ जो दिव्य विष्णुपद है, वह दर्शनमात्रसे पापका नाश करनेवाला है। स्पर्श और पूजन करनेपर वह पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। विष्णुपदमें पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य अपनी सहस्र पीढ़ियोंका उद्धार करके उन्हें विष्णुलोक पहुँचा देता है। रुद्रपद अथवा शुभ ब्रह्मपदमें श्राद्ध करके पुरुष अपने ही साथ अपनी सौ पीढ़ियोंको शिवधाममें पहुँचा देता है। दक्षिणाग्निपदमें श्राद्ध करनेवाला वाजपेय-यज्ञका और गार्हपत्यपदमें श्राद्ध करनेवाला राजसूय-यज्ञका फल पाता है। चन्द्रपदमें श्राद्ध करके अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। सत्यपदमें श्राद्ध करनेसे ज्योतिष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। आवसथ्यपदमें श्राद्ध करनेवाला चन्द्रलोकको जाता है और इन्द्रपदमें श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको इन्द्रलोक पहुँचा देता है। दूसरे-दूसरे देवताओंके जो पद हैं, उनमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। सबमें काश्यपपद श्रेष्ठ है। विष्णुपद, रुद्रपद तथा ब्रह्मपदको भी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मोहिनी! आरम्भ और समाप्तिके दिनमें इनमेंसे किसी एक पदपर श्राद्ध