भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 688, कुल 770 में से

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पृष्ठ 688
६८६* संक्षिप्त नारदपुराण *

अविमुक्त क्षेत्र—काशीपुरीकी महिमा

मान्धाता बोले— भगवन्! मोहिनीने पितरोंका उत्तम गति देनेवाले गया-माहात्म्यको सुनकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसुसे पुनः क्या पूछा?

वसिष्ठजी बोले— राजन्! सुनो, मोहिनीने पुनः जो प्रश्न किया, वह बतलाता हूँ।

मोहिनीने कहा— लोकोद्धारपरायण द्विजश्रेष्ठ! आपको बारम्बार साधुवाद है, आप बड़े दयालु हैं। ब्रह्मन्! मैंने गयाजीका परम उत्तम पवित्र माहात्म्य सुना, जो परम गोपनीय और पितरोंको सद्गति देनेवाला है। विप्रेन्द्र! अब काशीका उत्तम माहात्म्य बताइये।

वसिष्ठजी कहते हैं— मोहिनीका यह कथन सुनकर उसके पुरोहित वसु बोले—सुनो।

पुरोहित वसुने कहा— कल्याणमयी काशीपुरी धन्य है। भगवान् महेश्वर भी धन्य हैं, जो मुक्तिदायिनी वैष्णवपुरी काशीको श्रीहरिसे माँगकर निरन्तर उसका सेवन करते हैं। सनातनदेव भगवान् शङ्कर श्रीहरिके क्षेत्रमें ही विद्यमान हैं। वे भगवान् हृषीकेशकी पूजा करते हुए स्वयं भी देवता आदिसे पूजित होते हैं। काशीपुरी तीनों लोकोंका सार है। उस रमणीय नगरीका यदि सेवन किया जाय तो वह मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली है। नाना प्रकारके पापकर्म करनेवाले मनुष्य भी यहाँ आकर अपने पापोंका नाश करके रजोगुणरहित तथा शुद्ध अन्तःकरणके प्रकाशसे युक्त हो जाते हैं। इसे ‘वैष्णवक्षेत्र’ तथा ‘शैवक्षेत्र’ भी कहते हैं। यह सब प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला है। महापातकी मनुष्य भी जब भगवान् शिवकी नगरी काशीपुरीमें आता है, तब उसका शरीर संसारके सुदृढ़ बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जो पुण्यात्मा मनुष्य भगवान् विष्णु या भगवान् शिवके भक्त होकर सबको प्रतिदिन आदरबुद्धिसे देखते हुए इस क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे शुद्ध संत पुरुष भगवान् शङ्करके समान हैं। वे भय, दुःख और पापसे रहित हो जाते हैं। उनके कर्मकलाप पूर्णतः शुद्ध होते हैं और वे जन्म-मृत्युके गहन जालका भेदन करके परम मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। काशीका विस्तार पूर्वसे पश्चिमकी ओर ढाई योजनतक है और दक्षिणसे उत्तरकी ओर असीसे वरणातक आधे योजनका विस्तार है। शुभे! असी शुष्क नदी है। भगवान् शिवने इस क्षेत्रका यही विस्तार बताया है। काशीमें जो तिमिचण्डेश्वर नामक शिवलिङ्ग है, उससे उत्तरायण जानना चाहिये और शंकुकर्णको दक्षिणायन। वह ॐकारमें स्थित है। तदनन्तर पिङ्गला नामक तीर्थ आग्नेय कोणमें स्थित बताया गया है। सूखी हुई नदी जो असी नामसे प्रसिद्ध है, उसीको पिङ्गला नाड़ी समझना चाहिये। उसीके आस-पास लोलार्कतीर्थ विद्यमान है। इडा नामकी नाड़ी सौम्या कही गयी है। उसीको वरणाके नामसे जानना चाहिये, जहाँ भगवान् केशवका स्थान है। इन दोनोंके बीचमें सुषुम्णा नाड़ीकी स्थिति कही गयी है। मत्स्योदरीको ही सुषुम्णा जानना चाहिये। इस महाक्षेत्रको भगवान् शिव और भगवान् विष्णुने कभी विमुक्त (परित्यक्त) नहीं किया है और न भविष्यमें भी करेंगे। इसीलिये इसका नाम ‘अविमुक्त’ है। शुभे! प्रयाग आदि दुस्तर (दुर्लभ) तीर्थसे भी काशीका माहात्म्य अधिक है, क्योंकि वहाँ सबको अनायास ही मोक्षकी प्राप्ति होती है।

निषिद्ध कर्म करनेवाले जो नाना वर्णके लोग हैं तथा महान् पातकों और पापोंसे परिपूर्ण शरीरवाले जो घृणित चाण्डाल आदि हैं, उन सबके लिये विद्वानोंने अविमुक्तक्षेत्रको उत्तम औषध माना है। वहाँ दुष्ट, अन्धे, दीन, कृपण, पापी और दुराचारी सबको भगवान् शिव अपनी कृपाशक्तिके द्वारा