संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 690, कुल 770 में से
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सकाम हो या निष्काम अथवा वह पशु-पक्षीकी योनिमें क्यों न पड़ा हो, अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में प्राण-त्याग करनेपर वह अवश्य ही मोक्षका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। जो मानव सदा भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले और उनके अनन्य भक्त हैं, उन्हींके चिन्तनमें जिनका चित्त आसक्त है और भगवान् शिवमें ही जिनके प्राण बसते हैं, वे निःसंदेह जीवन्मुक्त हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें मृत्युके समय साक्षात् भगवान् भूतनाथ कर्मप्रेरित जीवोंके कानमें मन्त्रोपदेश देते हैं। स्वयं भगवान् श्रीरामने अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो अविमुक्तनिवासी कल्याणकारी शिवसे यह कहा है कि 'शिव ! तुम जिस-किसी भी मुमूर्षु जीवके दाहिने कानमें मेरे मन्त्रका उपदेश करोगे, वह मुक्त हो जायगा।' अतः भगवान् शिवकी कृपाशक्तिसे अनुगृहीत हो सभी जीव वहाँ परम गतिको प्राप्त होते हैं। मोहिनी ! यह मैंने अविमुक्तक्षेत्रके संक्षेपमें बहुत थोड़े गुण बताये हैं। समुद्रके रत्नोंकी भाँति अविमुक्तक्षेत्रके गुणोंका विस्तार अनन्त है। जो ज्ञान-विज्ञानमें निष्ठा रखनेवाले तथा परमानन्दकी प्राप्तिके इच्छुक हैं, उनके लिये जो गति बतायी गयी है, निश्चय ही काशीमें मरे हुएको वही गति प्राप्त होती है।
काशीका योगपीठ है श्मशानतीर्थ, जिसे मणिकर्णिका कहते हैं। अपने कर्मसे भ्रष्ट हुए मनुष्योंको भी काशीके श्मशानादि तीर्थोंमें मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है। काशीमें भी अन्य सब तीर्थोंकी अपेक्षा मणिकर्णिका उत्तम मानी गयी है। वहाँ नित्य भगवान् शिवका निवास माना गया है। वरानने ! दस अश्वमेध-यज्ञोंका जो फल बताया गया है, उसे धर्मात्मा पुरुष मणिकर्णिकामें स्नान करके प्राप्त कर लेता है। जो यहाँ वेदवेत्ता ब्राह्मणको अपना धन दान करता है, वह शुभगतिको पाता और अग्निकी भाँति तेजसे उद्दीप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ उपवास करके ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, वह निश्चय ही सौत्रामणी यज्ञका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य वहाँ चार वत्सतरीसे युक्त सौम्य स्वभावके तरुण वृषभको छत्र आदिसे चिह्नित करके छोड़ता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इसमें संदेह नहीं कि वह पितरोंके साथ मोक्षको प्राप्त होता है। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, भगवान् शिवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे वहाँ जो कुछ भी धर्म आदि किया जाता है, उसका फल अनन्त है। जो अविमुक्तक्षेत्रमें महादेवजीकी पूजा और स्तुति करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त एवं अजर-अमर होकर स्वर्गमें निवास करते हैं। जो मुक्तात्मा पुरुष एकाग्रचित्त हो इन्द्रिय-समुदायको संयममें रखकर ध्यान लगाये हुए शतरुद्रीका जप करते हैं और अविमुक्तक्षेत्रमें सदा निवास करते हैं, वे उत्तम द्विज कृतार्थ हो जाते हैं। यशस्विनी ! जो काशीमें एक दिन उपवास करेगा, उसे सौ वर्षोंतक उपवास करनेका फल प्राप्त होगा।
इससे आगे गङ्गा और वरणाका संगमरूप उत्तम तीर्थ है, जो सायुज्य मुक्ति देनेवाला है। जब बुधवारको श्रवण और द्वादशीका योग हो, उस समय उसमें स्नान करके मनुष्य मोक्षरूप फल पाता है। शुभानने ! जो वहाँ उस समय श्राद्ध करता है, वह अपने समस्त पितरोंका उद्धार करके विष्णुलोकमें जाता है। गङ्गाके साथ वरणा और असीका जो संगम है, वह समस्त लोकोंमें विख्यात है; वहाँ विधिपूर्वक अश्वदान करके मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक संगमेश्वरका पूजन करता है, वह निग्रह और अनुग्रहमें समर्थ साक्षात् देवदेवेश्वर शिव (-तुल्य) है। देवेश्वरसे पूर्वमें भगवान् केशव विद्यमान हैं और केशवके पूर्वमें जगद्विख्यात संगमेश्वर विद्यमान हैं।