भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 694

६९२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


मिष्टान्नके साथ उनका दान करना चाहिये। चैत्रके शुक्लपक्षमें महान् फल देनेवाली जो तृतीया है, उसमें मनुष्योंको भक्तिभावसे गौरी-देवीका दर्शन करना चाहिये। वरानने! स्नान करके गोप्रेक्षतीर्थमें जाना चाहिये और स्वर्गद्वारमें जो कालिका देवी हैं, उनकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। उनके सिवा संवर्ता और ललिता भी श्रेष्ठ एवं कल्याणमयी देवी कही गयी हैं, उनका भी भक्तिभावसे दर्शन करना चाहिये। वे सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाली हैं। तदनन्तर पवित्र व्रतका पालन करनेवाले शिवभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना और वस्त्र तथा भरपूर दक्षिणाद्वारा उनका यथायोग्य सत्कार करना चाहिये।

अब मैं उन विनायकोंका परिचय देता हूँ, जो काशीक्षेत्रके निवासमें विघ्न डालनेवाले हैं। देवि! उनका पूजन करके मनुष्य काशीवासका निर्विघ्न फल प्राप्त करता है। पहले ढुंढिविनायक, फिर किलविनायक, देवीविनायक, गोप्रेक्षविनायक, हस्तिहस्तीविनायक तथा सिन्दूर्यविनायकका दर्शन करना चाहिये। देवि! चतुर्थीको इन सभी विनायकोंका दर्शन करे और इनकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको मिठाई खिलावे। इस कार्यसे मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है।

अब मैं काशीक्षेत्रकी रक्षा करनेवाली चण्डिकाओंका वर्णन करता हूँ। दक्षिण दिशामें दुर्गा रक्षा करती हैं। नैर्ऋत्य कोणमें अन्तरेश्वरी, पश्चिममें अङ्गारेश्वरी, वायव्य कोणमें भद्रकाली, उत्तर दिशामें भीमचण्डा, ईशानकोणमें महामत्ता, पूर्व दिशामें ऊर्ध्वकेशीसहित शङ्खुरीदेवी, अग्निकोणमें अधःकेशी तथा मध्यभागमें चित्रघण्टादेवी रक्षा करती हैं। जो मानव इन चण्डिका देवियोंका दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर वे सब-की-सब तत्परतापूर्वक उसके लिये क्षेत्रकी रक्षा करती हैं। देवि! ये पापियोंके लिये सदा विघ्न उपस्थित करती हैं, अतः रक्षाके लिये विनायकोंसहित उक्त देवियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये।

भीष्मजी काशीपुरीमें आकर उत्तम पञ्चायतनरूपसे देवेश्वर शिवकी आराधना करते हुए कुछ कालतक यहाँ रहे। सुभगे! उस स्थानपर भगवान् शिव स्वयं प्रकट हुए थे, जो 'गोप्रेक्षक' के नामसे विख्यात हुए। सम्पूर्ण देवता उनकी स्तुति करते हैं। गोप्रेक्षेश्वरके पास आकर उनका दर्शन और पूजन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। एक समय वनकी गौएँ दावानलसे दग्ध हो इधर-उधर भटकती हुई इस कुण्डके समीप आयीं और यहाँका जल पीकर शान्त हुईं। तबसे यह 'कपिलाह्रद' कहलाता है। यहाँ प्रकट होकर साक्षात् भगवान् शिव 'वृषध्वज' नामसे विख्यात हुए। भगवान् शिवने न केवल वहाँ निवास किया, वे वहाँ सबको प्रत्यक्ष दर्शन देते हुए शिवलिङ्गरूपमें विराजमान हैं। जो एकाग्रचित्त हो इस कपिलाह्रद-तीर्थमें स्नान करके वृषध्वज