भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 698, कुल 770 में से

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पृष्ठ 698

६९६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


स्नान करके भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें निवास करते हैं। जो उत्कलमें परम पवित्र श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रके भीतर निवास करते हैं, उन उत्तम बुद्धिवाले उत्कलवासियोंका ही जीवन सफल है; क्योंकि वे भगवान् श्रीकृष्णके उस मुखारविन्दका दर्शन करते हैं, जो तीनों लोकोंको आनन्द देनेवाला है। भगवान्‌का मुख लाल ओष्ठ और प्रसन्नतासे खिले हुए विशाल नेत्रोंसे सुशोभित है। मनोहर भौंहों, सुन्दर केशों और दिव्य मुकुटसे अलंकृत है। सुन्दर कर्णलतासे उसकी शोभा और बढ़ गयी है। उस मुखपर मन्द-मन्द मुसकान बड़ी मनोहर लगती है। दन्तावली भी बड़ी सुन्दर है। कपोलोंपर मनोहर कुण्डल झलमिला रहे हैं। नासिका, कपोल सभी परम सुन्दर और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हैं।

देवि ! प्राचीन कालकी बात है। सत्ययुगमें इन्द्रके तुल्य पराक्रमी एक राजा थे, जो श्रीमान् 'इन्द्रद्युम्न' के नामसे प्रसिद्ध हुए। वे बड़े सत्यवादी, पवित्र, कार्यदक्ष, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, सौभाग्यशाली, शूर, दाता, भोक्ता, प्रिय वचन बोलनेवाले, सम्पूर्ण यज्ञोंके याजक, ब्राह्मण-भक्त, सत्य-प्रतिज्ञ, धनुर्वेद तथा वेद-शास्त्रके निपुण विद्वान् एवं चन्द्रमाकी भाँति मधुर प्रकृतिके थे। राजा इन्द्रद्युम्न भगवान् विष्णुके भक्त, सत्यपरायण, क्रोधको जीतनेवाले, जितेन्द्रिय, अध्यात्मविद्यातत्पर, न्यायप्राप्त युद्धके लिये उत्सुक तथा धर्मपरायण थे। इस प्रकार सम्पूर्ण गुणोंकी खानरूप राजा इन्द्रद्युम्न सारी पृथ्वीका पालन करते थे। एक बार उनके मनमें भगवान् विष्णुकी आराधनाका विचार उठा। वे सोचने लगे—'मैं देवदेव भगवान् जनार्दनकी किस प्रकार आराधना करूँ? किस क्षेत्रमें, किस नदीके तटपर, किस तीर्थमें अथवा किस आश्रममें मुझे भगवान्‌की आराधना करनी चाहिये?' इस प्रकार विचार करते हुए वे मन-ही-मन समूची पृथ्वीपर दृष्टिपात करने लगे। जो-जो पापहारी तीर्थ हैं, उन सबका मानसिक अवलोकन और चिन्तन करके अन्तमें वे परम विख्यात मुक्तिदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें गये। अधिकाधिक सेना और वाहनोंके साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाकर राजाने विधिपूर्वक अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया और उसमें पर्याप्त दक्षिणाएँ दीं। तदनन्तर बहुत ऊँचा मन्दिर बनवाकर अधिक दक्षिणाके साथ श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राको स्थापित किया। फिर उन पराक्रमी नरेशने विधिपूर्वक पञ्चतीर्थ करके वहाँ प्रतिदिन स्नान, दान, जप, होम, देवदर्शन तथा भक्तिभावसे भगवान् पुरुषोत्तमकी सविधि आराधना करते हुए देवदेव जगन्नाथके प्रसादसे मोक्ष प्राप्त कर लिया।


राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति

मोहिनी बोली—मुनिश्रेष्ठ ! पूर्वकालमें महाराज इन्द्रद्युम्नने श्रीकृष्ण आदिकी प्रतिमाओंका निर्माण कैसे कराया? भगवान् लक्ष्मीपति उनपर किस प्रकार संतुष्ट हुए? ये सब बातें मुझे बताइये।

पुरोहित वसुने कहा—चारुनयने ! वेदके तुल्य माननीय पुराणकी बातें सुनो। मैं श्रीकृष्ण आदिकी प्रतिमाओंके प्रकट होनेका प्राचीन वृत्तान्त कहता हूँ, सुनो। राजा इन्द्रद्युम्नके अश्वमेध नामक महायज्ञके अनुष्ठान और प्रासाद-निर्माणका कार्य पूर्ण हो जानेपर उनके मनमें दिन-रात प्रतिमाके लिये चिन्ता रहने लगी। वे सोचने लगे—'कौन-सा उपाय करूँ, जिससे सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके उत्पादक देवेश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका मुझे दर्शन हो'—इसी चिन्तामें निमग्न रहनेके कारण महाराजको न रातमें नींद आती थी, न दिनमें। वे न तो भाँति-भाँतिके भोग