भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 715
  • उत्तरभाग * ७१३

करे। किसी कामनाके लिये जप करना हो तो उसके लिये शास्त्रोंमें जितना बताया गया हो उतनी संख्यामें जप करे अथवा निष्कामभावसे जितना हो सके उतना एकाग्र चित्तसे जप करे। पद्म, शङ्ख, श्रीवत्स, गदा, गरुड़, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष—ये आठ मुद्राएँ बतायी गयी हैं।

शुभे! जो लोग शास्त्रोक्त मन्त्रोंद्वारा श्रीहरिकी पूजाका विधान न जानते हों वे 'ॐ नमो नारायणाय' इस मूलमन्त्रसे ही सदा भगवान् अच्युतका पूजन करें।


समुद्र-स्नानकी महिमा और श्रीकृष्ण-बलराम आदिके दर्शन आदिकी महिमा तथा श्रीकृष्णसे जगत्-सृष्टिका कथन एवं श्रीराधाकृष्णके उत्कृष्ट स्वरूपका प्रतिपादन

पुरोहित वसु कहते हैं— मोहिनी! इस प्रकार भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी विधिवत् पूजा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। फिर समुद्रसे प्रार्थना करे—

प्राणस्त्वं सर्वभूतानां योनिश्च सरितां पते।
तीर्थराज नमस्तेऽस्तु त्राहि मामच्युतप्रिय॥
(ना० उत्तर० ५८। २)

'सरिताओंके स्वामी तीर्थराज! आप सम्पूर्ण भूतोंके प्राण और योनि हैं। आपको नमस्कार है। अच्युतप्रिय! मेरी रक्षा कीजिये।'

इस प्रकार उस उत्तम क्षेत्र समुद्रमें भलीभाँति स्नान करके तटपर अविनाशी भगवान् नारायणकी विधिपूर्वक पूजा करे। तदनन्तर समुद्रको प्रणाम करके बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राके चरणोंमें मस्तक झुकाना चाहिये। ऐसा करनेवाला मानव सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है और सब पापोंसे मुक्त हो सब प्रकारके दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। अन्तमें सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर बैठकर श्रीविष्णुलोकमें जाता है। ग्रहण, संक्रान्ति, अयनारम्भ, विषुवयोग, युगादि तिथि, मन्वादि तिथि, व्यतीपातयोग, तिथिक्षय, आषाढ़, कार्तिक और माघकी पूर्णिमा तथा अन्य शुभ तिथियोंमें जो उत्तम बुद्धिवाले पुरुष वहाँ ब्राह्मणोंको दान देते हैं, वे अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा हजार गुना फल पाते हैं, जो लोग वहाँ विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान देते हैं, उनके पितर अक्षय तृप्ति-लाभ करते हैं।

देवि! इस प्रकार मैंने समुद्रमें स्नान, दान एवं पिण्डदान करनेका फल बतलाया। यह धर्म, अर्थ एवं मोक्षरूप फल देनेवाला, आयु, कीर्ति तथा यशको बढ़ानेवाला, मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाला तथा उनके बुरे स्वप्नोंका नाश करनेवाला धन्य साधन है। यह सब पापोंको दूर करनेवाला, पवित्र तथा इच्छानुसार सब फलोंको देनेवाला है। इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ, नदियाँ और सरोवर हैं, वे सब समुद्रमें प्रवेश करते हैं, इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ है। सरिताओंका स्वामी समुद्र सब तीर्थोंका राजा है, अतः वह सभी तीर्थोंसे श्रेष्ठ है। जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है उसी प्रकार तीर्थराज समुद्रमें स्नान करनेपर सब पापोंका क्षय हो जाता है। जहाँ निन्यानबे करोड़ तीर्थ रहते हैं उस तीर्थराजके गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है। अतः वहाँ स्नान, दान, होम, जप तथा देवपूजन आदि जो कुछ सत्कर्म किया जाता है, वह अक्षय बताया गया है।

मोहिनीने पूछा— गुरुदेव! पुराणोंमें राधामाधवका वर्णन रहस्यरूप है। सुव्रत! आप सब कुछ यथार्थरूपसे जानते हैं; अतः उसे बताइये।