संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 717, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * ७१५
करने लगा। भामिनि! जलमें सोये हुए विराट् पुरुषके बोलने आदि व्यवहारकी सिद्धिके लिये मुख आदि अङ्ग तथा भिन्न-भिन्न अवयव प्रकट हुए। उस पुरुषकी नाभिसे एक कमल उत्पन्न हुआ जो सहस्रों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान था। उस कमलसे सम्पूर्ण जगत्के प्रपितामह स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। उन्होंने तीव्र तपस्या करके परम पुरुष परमात्माकी आज्ञा ले लोकों और लोकपालोंकी रचना की। ब्रह्माजीने कटि आदि नीचेके अङ्गोंसे सात पातालोंकी और ऊपरके अङ्गोंसे भूः आदि सात लोकोंकी सृष्टि की। इन चौदह भुवनोंसे युक्त ब्रह्माण्ड बताया गया है। ब्रह्माजीने इस चतुर्दशभुवनात्मक ब्रह्माण्डमें समस्त चराचर भूतोंकी सृष्टि की है। ब्रह्माजीके मनसे चार सनकादि महात्मा उत्पन्न हुए हैं। देवि! ब्रह्माजीके शरीरसे भृगु आदि पुत्र उत्पन्न हुए हैं, जिन्होंने इस जगत्को बढ़ाया है।
पुरोहित वसु कहते हैं—महाभागे! वे जो निरञ्जन, सच्चिदानन्दस्वरूप, ज्योतिर्मय, जनार्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उनका लक्षण सुनो। वे सर्वव्यापी हैं और ज्योतिर्मय गोलोकके भीतर नित्य निवास करते हैं। एकमात्र श्रीकृष्ण ही दृश्य तथा अदृश्यरूपधारी परब्रह्म हैं। मोहिनी! गोलोकमें गौएँ, गोप और गोपियाँ हैं। वहाँ वृन्दावन, सैकड़ों शिखरोंवाला गोवर्धन पर्वत, विरजा नदी, नाना वृक्ष, भाँति-भाँतिके पक्षी आदि वस्तुएँ विद्यमान हैं। विशिनन्दिनि! जबतक प्रकृति जागती है तबतक गोलोकमें सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्यक्षरूपसे ही विराजमान होते हैं। प्रलयकालमें गौएँ आदि सो जाती हैं, अतः वे परमात्माको नहीं जान पातीं। वे परमात्मा तेजःपुञ्जके भीतर कमनीय शरीर धारण करके किशोररूपसे विराजमान होते हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मेघके समान श्याम है। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा है। उनके दो हाथ हैं। हाथमें मुरली सुशोभित है। वे भगवान् किरीट-कुण्डल आदिसे विभूषित हैं। श्रीराधा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हैं। श्रीराधिकाजी उनकी आराधिका हैं। उनका वर्ण सुवर्णके समान उद्भासित होता है। देवी श्रीराधा प्रकृतिसे परे स्थित सच्चिदानन्दमयी हैं। वे दोनों भिन्न-भिन्न देह धारण करके स्थित हैं, तो भी उनमें कोई भेद नहीं है। उनका स्वरूप नित्य है। जैसे दूध और उसकी धवलता, पृथ्वी और उसकी गन्ध एक और अभिन्न हैं उसी प्रकार वे दोनों प्रिया-प्रियतम एक हैं। जो कारणका भी कारण है उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। जो वेदके लिये भी अनिर्वचनीय है उसका वर्णन कदापि सम्भव नहीं है।
इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नानकी विधि, ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राके अभिषेकका उत्सव
पुरोहित वसु कहते हैं—ब्रह्मपुत्री मोहिनी! वहाँसे उस तीर्थमें जाय जो अश्वमेधयज्ञके अङ्गसे उत्पन्न हुआ है। उसका नाम है इन्द्रद्युम्न-सरोवर। वह पवित्र एवं शुभ तीर्थ है। बुद्धिमान् पुरुष वहाँ जाकर पवित्रभावसे आचमन करे और मन-ही-मन भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके जलमें उतरे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—
अश्वमेधाङ्गसम्भूत तीर्थ सर्वाघनाशन।
स्नानं त्वयि करोम्यद्य पापं हर नमोऽस्तु ते॥
(ना० उत्तर० ६०। ३)
‘अश्वमेधयज्ञके अङ्गसे प्रकट हुए तथा सम्पूर्ण पापोंके विनाशक तीर्थ! आज मैं तुम्हारे जलमें स्नान करता हूँ। मेरे पाप हर लो। तुमको नमस्कार है।’