संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 737, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * | ७३५
विराजमान हुए थे। जो मनुष्य वहाँ स्नान और नरसिंह शिलाका पूजन करता है, वह पुनरावृत्तिरहित वैष्णवधामको प्राप्त कर लेता है। देवि! वहाँ पाँचवीं 'नर-नारायण' शिला है। सत्ययुगमें भोग और मोक्ष देनेवाले भगवान् नर-नारायणावतार श्रीहरि सबके सामने प्रत्यक्ष निवास करते थे। शुभे! त्रेता आनेपर वे केवल मुनियों, देवताओं और योगियोंको दिखायी देते थे। द्वापर आनेपर केवल ज्ञानयोगसे उनका दर्शन होने लगा। तब ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपस्वी ऋषियोंने अपनी विचित्र वाणीद्वारा स्तुति करके भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न किया। तदनन्तर उन ब्रह्मा आदि देवताओंसे आकाशवाणीने कहा—'देवेश्वरो! यदि तुम्हें स्वरूपके दर्शनकी श्रद्धा है तो नारदकुण्डमें जो मेरी शिलामयी मूर्ति पड़ी हुई है, उसे ले लो।' तब उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्मा आदि देवताओंका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने नारदकुण्डमें पड़ी हुई उस शिलामयी दिव्य प्रतिमाको निकालकर वहाँ स्थापित कर दिया और उसकी पूजा करके अपने-अपने धामको चले गये। वे देवगण प्रतिवर्ष वैशाखमासमें अपने धामको जाते हैं और कार्तिकमें आकर फिर पूजा प्रारम्भ करते हैं। इसलिये वैशाखसे बर्फके कष्टका निवारण हो जानेसे पापकर्मरहित पुण्यात्मा मनुष्य वहाँ श्रीहरिके विग्रहका दर्शन पाते हैं। छः महीने देवताओं और छः महीने मनुष्योंके द्वारा उस भगवद्विग्रहकी पूजा की जाती है। इस व्यवस्थाके साथ तबसे भगवान्की प्रतिमा प्रकट हुई। जो भगवान् विष्णुकी उस शिलामयी प्रतिमाका भक्तिभावसे पूजन करता है और उसका नैवेद्य (प्रसाद) भक्षण करता है, वह निश्चय ही मोक्ष पाता है। इस प्रकार वहाँ ये पाँच पुण्य शिलाएँ स्थित हैं। श्रीहरिका नैवेद्य देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, फिर मनुष्य आदिके लिये तो कहना ही क्या है। उस नैवेद्यका भक्षण कर लेनेपर वह मोक्षका साधक होता है। बदरीतीर्थमें भगवान् विष्णुका सिक्थमात्र (थोड़ा) भी प्रसाद यदि खा लिया जाय तो वह पापका नाश करता है।
मोहिनी! वहीं एक दूसरा महान् तीर्थ है, उसका वर्णन सुनो; उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष वेदोंका पारङ्गत विद्वान् होता है। एक समय सोते हुए ब्रह्माजीके मुखसे निकले हुए मूर्तिमान् वेदोंको हयग्रीव नामक असुरने हर लिया। वह देवता आदिके लिये बड़ा भयंकर था। तब ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की। अतः वे मत्स्यरूपसे प्रकट हुए। उस असुरको मारकर उन्होंने सब वेद ब्रह्माजीको लौटा दिये। तबसे वह स्थान महान् पुण्यतीर्थ हो गया। वह सब विद्याओंका प्रकाशक है। महाभागे! तैमिङ्गिलतीर्थ दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। तदनन्तर किसी समय अविनाशी भगवान् विष्णुने पुनः वेदोंका अपहरण करनेवाले दो मतवाले असुर मधु और कैटभको हयग्रीवरूपसे मारकर फिर ब्रह्माजीको वेद लौटाये। अतः ब्रह्मकुमारी! वह तीर्थ स्नानमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। भद्रे! मत्स्य और हयग्रीवतीर्थमें द्रवरूपधारी वेद सदा विद्यमान रहते हैं। अतः वहाँका जल सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहीं एक दूसरा मनोरम तीर्थ है, जो मानसोद्भेदक नामसे विख्यात है। वह हृदयकी गाँठ खोल देता है, मनके समस्त संशयोंका नाश करता है और सारे पापोंको भी हर लेता है। इसलिये वह मानसोद्भेदक कहलाता है। वरानने! वहीं कामाकाम नामक दूसरा तीर्थ है, जो सकाम पुरुषोंकी कामना पूर्ण करनेवाला और निष्कामभाववाले पुरुषोंको मोक्ष देनेवाला है। भद्रे! वहाँसे पश्चिम वसुधारातीर्थ है। वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाता है। इस वसुधारातीर्थमें