संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-प्रथम पाद * ७९
किये जाते, वे राखमें डाली हुई आहुतिके समान व्यर्थ होते हैं। नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा जो मोक्षके साधनभूत कर्म हैं, वे सब भगवान् विष्णुके समर्पित होनेपर सात्त्विक और सफल होते हैं।
भगवान् विष्णुकी उत्तम भक्ति सब पापोंका नाश करनेवाली है। नृपश्रेष्ठ! सात्त्विक, राजस और तामस आदि भेदोंसे भक्ति दस¹ प्रकारकी जाननी चाहिये। वह पापरूपी वनको जलानेके लिये दावानलके समान है। राजन्! जो दूसरेका विनाश करनेके लिये भगवान् लक्ष्मीपतिका भजन किया जाता है, वह 'अधमा तामसी' भक्ति है; क्योंकि वह दुष्टभाव धारण करनेवाली है। जो मनमें कपटबुद्धि रखकर, जैसे व्यभिचारिणी स्त्री अपने पतिकी सेवा करती है, उस प्रकार जगदीश्वर भगवान् नारायणका पूजन करता है, उसकी वह 'मध्यमा तामसी' भक्ति है। पृथ्वीपाल! जो दूसरोंको भगवान्की आराधनामें तत्पर देखकर ईर्ष्यावश स्वयं भी भगवान् श्रीहरिकी पूजा करता है, उसकी वह क्रिया 'उत्तमा तामसी' भक्ति मानी गयी है। जो धन-धान्य आदिकी याचना करते हुए परम श्रद्धाके साथ श्रीहरिकी अर्चना करता है, वह पूजा 'अधमा राजसी' भक्ति मानी गयी है। जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात कीर्तिका उद्देश्य रखकर परम भक्तिभावसे भगवान्की आराधना करता है, उसकी वह क्रिया 'मध्यमा राजसी' भक्ति कही गयी है। पृथ्वीपते! जो सालोक्य और सारूप्य आदि पद प्राप्त करनेकी इच्छासे भगवान् विष्णुकी अर्चना करता है, उसके द्वारा की हुई वह पूजा 'उत्तमा राजसी' भक्ति कही गयी है। जो अपने किये हुए पापोंका नाश करनेके लिये पूर्ण श्रद्धाके साथ श्रीहरिकी पूजा करता है, उसकी की हुई वह पूजा 'अधमा सात्त्विकी' भक्ति मानी गयी है। 'यह भगवान् विष्णुको प्रिय है' ऐसा मानकर जो श्रद्धापूर्वक सेवा-शुश्रूषा करता है, उसकी वह सेवा 'मध्यमा सात्त्विकी' भक्ति है। राजन्! 'शास्त्रकी ऐसी ही आज्ञा है' यह मानकर जो दासकी भाँति भगवान् लक्ष्मीपतिकी पूजा-अर्चा करता है, उसकी वह भक्ति सब प्रकारकी भक्तियोंमें श्रेष्ठ 'उत्तमा सात्त्विकी' भक्ति मानी गयी है। जो भगवान् विष्णुकी थोड़ी-सी भी महिमा सुनकर परम संतुष्ट हो उनके ध्यानमें तन्मय हो जाता है, उसकी वह भक्ति 'उत्तमोत्तमा' मानी गयी है। 'मैं ही परम विष्णुरूप हूँ, मुझमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है।' इस प्रकार जो सदा भगवान्से अपनेको अभिन्न देखता है, उसे उत्तमोत्तम भक्त समझना चाहिये²। यह दस प्रकारकी भक्ति संसार-बन्धनका नाश करनेवाली है। उसमें भी
१. पहले सात्त्विक, राजस और तामस—भेदसे भक्तिके तीन भेद हैं। फिर प्रत्येकके उत्तम, मध्यम और अधम—ये तीन भेद और होते हैं। इस प्रकार नौ भेद हुए। दसवीं 'उत्तमोत्तमा परा भक्ति' है।
२. यच्चान्यस्य विनाशार्थं भजनं श्रीपतेर्नृप। सा तामस्यधमा भक्तिः खलभावधरा यतः॥
योऽर्चयेत्कैतवधिया स्वैरिणी स्वपतिं यथा। नारायणं जगन्नाथं तामसी मध्यमा तु सा॥
देवपूजापरान् दृष्ट्वा मात्सर्याद् योऽर्चयेद्धरिम्। सा भक्तिः पृथ्वीपाल तामसी चोत्तमा स्मृता॥
धनधान्यादिकं यस्तु प्रार्थयन्नर्चयेद्धरिम्। श्रद्धया परया युक्तः सा राजस्यधमा स्मृता॥
यः सर्वलोकविख्यातकीर्तिमुद्दिश्य माधवम्। अर्चयेत्परया भक्त्या सा मध्या राजसी मता॥
सालोक्यादि पदं यस्तु समुद्दिश्यार्चयेद्धरिम्। सा राजस्युत्तमा भक्तिः कीर्तिता पृथिवीपते॥
यस्तु स्वकृतपापानां क्षयार्थं प्रार्चयेद्धरिम्। श्रद्धया परयोपेतः सा सात्त्विक्यधमा स्मृता॥
हरेरिदं प्रियमिति शुश्रूषां कुरुते तु यः। श्रद्धया संयुतो भूयः सात्त्विकी मध्यमा तु सा॥
विधिबुद्ध्यार्चयेद्यस्तु दासवच्छ्रीपतिं नृप। भक्तीनां प्रवरा सा तु उत्तमा सात्त्विकी स्मृता॥